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🌺 शची गृह निमत्रण🌺
🌿एक दिन माता शची ने स्वप्न देखा और एकांत में पुत्र विश्वंभर से बोली - निमाई ! मैंने आज रात्रि के शेष काल में एक सपना देखा है , तुम और नित्यानंद दोनों 5 वर्ष के बालक होकर एक दूसरे से लड़ रहे हो और एक दूसरे के पीछे भाग रहे हो। इतने में तुम दोनों मेरे ठाकुर मंदिर में घुस गए । तुम तो श्री बलराम विग्रह को और नित्यानंद श्री कृष्ण विग्रह को हाथ में लेकर बाहर आ गए । हाय ! हाय ! मैंने देखा कि आज तो तुम चारों जन श्री कृष्ण , श्री बलराम, तुम और नित्यानंद आपस में लड़ रहे हो । मारो! मारो! कह रहे हो । फिर श्री कृष्ण बलराम क्रोधित होकर बोल उठे- तुम दोनों लुटेरे यहां कहां से आ गए ? यह घर तो हमारा है इसमें रखा सब सामान हमारा है और संदेश दूध दही हमारा है चलो तुम यहां से बाहर निकलो ।
💐 शची माता ने कहा - पुत्र फिर निताई बोले - बीत गया वह सब समय अब द्वापरयुग नहीं है जो तुम दूध , दही, मक्खन लूट लूट कर खा जाओगे ? पहचानो अपने को , ग्वालों की अब दाल नहीं गलेगी यहां। अब तो ब्राह्मणों का सब अधिकार है । देखो! यदि प्रेम से नहीं मानोगे तो दोनों पिट जाओगे। शची ने कहा - विशंभर! यह सुनकर बलराम बोला - अच्छा ऐसी बात है मुझे फिर कोई दोष नहीं देना । मैं तुम दोनों ठगों को आज यहां बांधकर बंद कर दूंगा । मुझे कृष्ण की शपथ है जो है ऐसा नहीं करूं । माता शची आगे बोली- हाय ! हाय ! निताई की तरफ बलराम गर्जना करने लगे।
🌹 तब नित्यानंद ने कहा - मुझे अब तेरे कृष्ण का कोई डर नहीं है देख मेरे साथ अब मेरा सर्वेश्वर विश्वंभर विद्यमान है। शची बोली- विश्वंभर ! मैं फिर क्या देखती हूं कि तुम चारों घर में रखें दूध दही संदेश आदि को लूट लूट कर खाने लगे। एक दूसरे से खींच खींच कर एक दूसरे के मुंह से निकाल निकाल कर। पुत्र इतने में निताई जोर से मेरा नाम लेकर चिल्ला उठा - माता ! मुझे खाने को दो मुझे बड़ी भूख लगी है मुझे। तभी मेरी आंख खुल गई कुछ नहीं था वहां बड़े आश्चर्य की बात है कैसा था यह अद्भुत स्वप्न ?
क्रमश :....,
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