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क्रम: 1⃣0⃣

           🌿 इसके बाद प्रभु महेंद्र पर्वत की चोटी पर पधारें और वहां विराजमान श्री परशुराम जी के दर्शन किए। वहां से हरिद्वार, पंपा, भीमरथी, सप्तगोदावरी होते हुए वेणवा तीर्थ में पधारे। हैदराबाद में जहां कृष्णा तथा वेणवा नदी का संगम है। वहां से प्रभु निताईचांद श्रीशैल पर्वत पर पधारे। जहां श्री शिव-पार्वती ब्राह्मण- ब्राह्मणी का रूप धारण कर विराजमान थे उन्होंने अपने इष्टदेव श्री संकर्षण श्री निताई चांद को पहचान लिया। वे जान गए कि ये अवधूत रूप से तीर्थ भ्रमण कर रहे हैं। श्रीशिव -पार्वती ने श्री प्रभु का सादर निमंत्रण किया और ब्राह्मणी -श्रीपार्वती जी ने अपने हाथ से रसोई कर इन्हें भिक्षा कराई। श्रीनिताई चाँद भी उन्हें जान गए। आपने उन्हें नमस्कार किया और मुस्कुरा दिए, न जाने दिल में क्या आया- उसे श्री कृष्ण ही जानते हैं?
                  🌺 वहां से श्रीनिताई चांद द्रविड़ देश पधारे। विंध्याचल का दक्षिणी प्रदेश द्राविड़, कर्नाट, गुज्जर, महाराष्ट्र एवं तेलंग यह पंचविध द्रविड़ माना गया है। वहां जाकर इन्होंने श्री वेंकट नाथ काम कोष्ठी पुरी का दर्शन किया। वहां से कावेरी एवं पावन श्रीरंगम में पधारें। वहां से श्रीहरि क्षेत्र में गए। वहां से ऋषभ पर्वत दक्षिण मथुरा कृतमाला भागा नदी, ताम्रपर्णी नदी, उत्तरा -यमुना मलय- पर्वत जहां अगस्तय मुनि का आश्रम है। वहां के निवासियों ने श्रीनिताई चांद का आतिथ्य किया।

                 🌸 वहां से प्रभुपाद फिर बद्रिकाश्रम में पहुंचे और परम आनंदित हुए। आपने वहां अनेक दिन तक नर नारायण आश्रम में परम एकांत में निवास किया। वहां से प्रभु श्री व्यासाश्रम (वर्तमान मानाल) में पहुंचे। श्री व्यास जी ने प्रभु श्री नित्यानंद को जान लिया और उनका सादर आतिथ्य किया। श्रीनिताई चांद श्रीव्यास जी को दंडवत प्रणाम किया। तत्पश्चात यह कन्यका नगर में पहुंचे। वहां उन्होंने दुर्गा देवी के दर्शन किए और दक्षिण सागर रामेश्वरम के पास मन्नार उपसागर जा पहुंचे। वहां स्नानादि कर प्रभुपाद ने श्री आनंतपुर जिसे फाल्गुन कहा गया है। से पंच अप्सरा सरोवर जाकर स्नान किया। वहां से गोकर्ण में श्री महादेव के दर्शन किए। फिर प्रभु केरल में होकर त्रिगर्त उत्तर कनारा में आए। वहां से द्वैपायनी आर्या पहुंचे, जो स्थान दीप निवासिनी देवी के नाम से विख्यात है। वहां से निर्विन्ध्या नदी में स्नान किया जो विंध्या पर्वत से निकलकर चंबल में मिली है। उसके बाद श्री प्रभुपाद ने आकर नर्मदा नदी में स्नान किया तथा नदी तटवर्ती महिष्मति पूरी, जैसे आज-कल महेशवरपुर कहते हैं, में पधारें । वहां मनु तीर्थ  के दर्शन किए । वहां से सुपार्क मुंबई के निकट सुपारा होते हुए श्री निताई चांद पश्चिम की ओर चल दिए। प्रभुपाद निर्भय होकर विचरण कर रहे थे। निरंतर अखंड कृष्णवेश में निमग्न थे। कभी कृष्ण विरह में रो उठते।  कभी हंसने लगते तो कभी भुजाओं को ऊपर उठा कर नाचने लगते।

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