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                 🌺श्री कृष्ण प्रेम सागर की दो तिरंगे बिछड़ गई आखिर। श्रीमाधवेंद्र पुरी सरयू की ओर चले और श्रीनिताई चांद सेतुबंध की तरफ। वहां धनु -तीर्थ में स्नान कर रामेश्वरम चले आए। वहां से मायापुरी चले आए। फिर श्रीनिताई चांद उज्जैन पहुंचे। वहां से गोदावरी का दर्शन करते हुए जीयड़ में पहुंचे और वहां श्री नरसिंह देव के दर्शन कर अति प्रेमोन्मत हो उठे। वहां से तिरुमल देखते हुए कूर्मक्षेत्र में आ पहुंचे। वहां इन्होंने कुर्मावतार भगवान श्री विष्णु के दर्शन किए।

                  🌸 आप वहां से नीलाचल श्री जगन्नाथ पुरी की तरफ चल पड़े अभी बहुत दूर थे श्री मंदिर से परंतु ध्वजा के दर्शन करते ही श्रीनिताई चांद पुलकित हो उठे। चतुव्यूहात्मक द्वारकाधीश श्री कृष्ण रूप श्री जगन्नाथ का दर्शन करते ही आनंद से विभोर होकर मूर्छित हो गए। जोर-जोर से हुंकार करने लगे। नेत्रों से अखंड अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी। दिन-रात परमानंद में निमग्न हो श्री नेताई चांद अनेक दिन तक श्री जगन्नाथ पुरी में रहे। वहां से गंगासागर पधारें, जहां श्रीगंगा सागर में मिल रही है।

                  🌺 इस प्रकार सर्व तीर्थ- भ्रमण कर तीर्थस्पद आनंद विठल श्री निताई चांद पुनः मथुरा मंडल में पधारे और निरंतर श्रीवृंदावन में प्रेमोन्मत्त हो विचरने लगे। श्री कृष्णवेश में कुंज- कुंज में विचरने लगे। खान-पान की तो कुछ सुधि ही न थी इन्हे। हा बिना मांगे दूध यदि उपलब्ध होता तो पान कर लेते। "हा कृषण! हा प्राण सखा " कह -कह कर उच्चस्वर में कभी क्रंदन करने लगते, कभी अट्हास करते। कभी वृंदावन के उन स्थलों को देख देखकर प्रभु मूर्छित हो घंटों अचेत पड़े रहते। जिन स्थलो पर आपने श्री बलराम रूप से श्री कृष्ण के साथ विहार किया था। गोपाल बालकों के साथ धूल में खेलते रहते। कोई इनको पहचान न सका और न ही इन्होंने अपने ऐश्वर्या का प्रकाश ही किया।

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