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🌿श्री निताई चांद मन में जान गए कि उनका भ्राता श्री कृष्ण नवदीप में अवतीर्ण हो चुका है । हां जब तक वह मुझे नहीं बुलाता मैं नहीं जाऊंगा नवदीप । मन में ऐसा निश्चय करके प्रभुपाद वृंदावन में ही विचरण करते रहे ।
🌹 कृष्ण भक्ति प्रदान करने में सर्वशक्ति धारी होकर भी श्री निताई चांद ने किसी को भी भक्ति प्रदान नहीं की । केवल इसीलिए जब श्री गौर चंद्र अपना प्रकाश करेंगे तभी उनकी आज्ञा से भक्ति दान का कार्य आरंभ होगा । यही तो है लीला परिकरो का कृष्ण अनुकूल अनुशीलन। सदा प्रभु के आदेश का इंतजार करते हैं। कभी स्वच्छंदता नहीं अपनाते ।
🌿हम आगे चलकर देखेंगे परम करुणामय , परम दयाल मूर्ति श्री निताई की कृपा से प्रेम धन पा कर त्रिभुवन धन्य हो उठेगा ।इनकी कृपा से ही गौर महिमा की स्फूर्ति होती है और श्री गौरांग देव की कृपा से श्री निताई चांद के चरणों में प्रीति उदय होती है--
*आदि देव जय जय नित्यानंद राय।*
*चैतन्य महिमा स्फुरे याहार कृपाय।।*
*चैतन्य कृपा हय नित्यानंदे रति।*
*नित्यानंद जानले आपद नासि कति।।*
(श्री चैतन्य भागवत) 1/ 6/ 420 -21
🌹 जो लोग गौरांग में प्रीति रखते हैं परंतु श्री निताई चांद ही उपेक्षा करते हैं अथवा उनके प्रति उनका प्रेम नहीं है वस्तुतः वह पाखंडी है क्योंकि श्री निताई चांद की कृपा के बिना भक्ति की प्राप्ति होना नितांत असंभव है। मूल भक्त अवतार है श्री बलराम। परम कृपासिंधु है वे। भक्ति प्रदाता है, वैष्णव है वे--
*मूल भक्त अवतार श्री बलराम।*
*कृपा सिंधु भक्ति दाता श्री वैष्णव नाम।।*
🌿 श्री निताई चांद ने समस्त तीर्थों के भ्रमण के पश्चात अपने नित्यधाम श्री वृंदावन में आकर विश्राम किया। उस क्षण की प्रतीक्षा करते रहे कब उनका प्राणप्रिय भाई गौर कृष्ण उन्हें अपने निकट बुलाता है।
क्रमशः ....
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