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क्रम: 1⃣5⃣

            🌿 अति आश्चर्य की बात कि उसने एक ही कान में विचित्र कुंडल धारण कर रखा था। ऐसा लगता था कि हलधर श्री बलराम आए हैं। "यही है निमाई पंडित का घर", यही है निमाई पंडित का घर ? कहां है विशंभर गोस्वामी ? दस बीस बार उसने ऐसा पूछा । मैंने ऐसा परम प्रचंड- उद्वणड अवधूत वेशधारी पुरुष कभी नहीं देखा था। देखकर यह सब मै चौंक उठा, पूछा -"महाजन! आप कौन हैं ? वह मुस्कुरा कर बोला -"नहीं जानते तुम मुझको ? भाई हूं तुम्हारा। कल तुमसे परिचय होगा। मुझे बड़ा हर्ष हुआ। उसके वचन सुनकर और ऐसा लगा कि मेरा ही कोई बांधव है।"

                🌿इतना कहते ही श्री निमाई सबके सामने हलधर भाव में आविष्ट हो उठे और गर्जना करते हुए - मद लाओ, वारुणी लाओ, कहते हुए हुंकार करने लगे। सब परिकरगण चमत्कृत हो उठे। हम कहां से मद लाये? प्रेम का अद्भुत मद् भंडार तो इन्हीं के पास है। श्रीसंकर्षण के आवेश में बोल रहे हैं यह सब। कुछ देर में श्रीगौरांग स्वस्थ हुए और सब से बोले - "अवश्य कोई महापुरुष नदिया में आ गया है -ऐसा मुझे लगता है। हरिदास ! श्रीवास ! जाओ न तुम, उसकी तलाश करो नदिया में चारों तरफ।

             🌿श्री महाप्रभु का आदेश पाकर दोनों गली-गली में उस महापुरुष की खोज करने लगे। सारा नवद्वीप उन्होंने छांट डाला परंतु श्री निताईचांद को न ढूंढ सके। ढूंढ ही कैसे सकते ? श्री निताईचांद की कृपा के बिना उनको कोई ढूंढ सकता है?  जब तक अपना अनुसंधान वे स्वयं न दें तब तक उन्हें कोई कैसे प्राप्त कर लेगा? लौट आए वापस तीसरे प्रहर श्रीगौरांगदेव के पास और निवेदन किया - प्रभो ! वे आगुन्तक महापुरुष हमें तो कहीं नहीं मिले।"  श्रीवास ! तुमने अच्छी प्रकार नहीं ढूंढा है।" -श्रीमन्नमहाप्रभु ने कहा । श्री हरिदास व श्रीवास ने निवेदन किया- "प्रभुपाद ! क्या वैष्णव, क्या सन्यासी, क्या गृहस्थ यहां तक कि पाखंडियों के घर- मुहल्लों में जा -जाकर हमने उस महापुरुष की खोज की है।

                  🌿  सारा नवद्वीप देख डाला है, करुणामय ऐसा लगता है, वह किसी दूसरे गांव में चले गए हैं" श्री हरिदास, श्रीवास के वचन सुनकर लीलाधारी हंस पड़े। मानो श्री नित्यानंद तत्व की गूढ़ता का प्रदर्शन कर रहे थे। वास्तव में श्रीनवद्वीप लीला में श्री नित्यानंद तत्व अतिशय गूढ़ तत्व है।  अनेक लोगों की श्रद्धा श्रीमन्नमहाप्रभु में है, किंतु श्री नित्यानंद प्रभु की उपेक्षा करते हैं। ऐसे लोगों के संबंध में श्री चैतन्य लीला के व्यास श्रीवृंदावनदास तथा कविकुल - मुकुटमणि श्रीकृष्णदास गोस्वामी ने तथा अन्याय समस्त गोस्वामीवृन्द ने स्पष्ट कहा है कि ऐसे लोग नरक में जाते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण को मानते हैं और भगवान शंकर को नहीं मानते । उन लोगों को जो अपराध लगता है वही अपराध ऐसे लोगो को लगता है वे श्रीनित्यानंद प्राण वल्लभ श्रीगौरांगदेव की कृपा प्राप्त नहीं कर सकते। वे भक्ति एवं वैष्णवता से कोसों दूर है।

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