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क्रम: 1⃣6⃣

            🌿  तो क्या श्रीहरिदास एवं श्रीवासादि श्रीनित्यानंद तत्व को नहीं जानते थे ? वह निज परिकर थे गौर लीला के। अवश्य श्री नित्यानंद तत्व को वे जानते थे, अच्छी प्रकार जानते थे श्री निताईचांद के स्वरूप तत्व को। परंतु लीला का आस्वादन कैसे बने ? कौतुकवश ऐसा अभिनय लीला शक्ति करा रही थी। क्षणकाल के लिए तो चुप बैठे रहे श्री गौरांग देव। फिर मुस्कुरा कर बोले -"आओ मेरे साथ, हम सब मिलकर अभी ढूंढते हैं उस कौतकी को।" सबने "जय कृष्ण" ध्वनि की और श्रीगौरांगदेव के पीछे -पीछे चल पड़े। सर्वज्ञ शिरोमणि सीधे नन्दनाचार्य के घर पर ही आ पहुंचे। विराजमान था एक दुष्प्राप्य महारत्न- पुरुष श्रीनंदनाचार्य के भवन में। सबने देखा, कोटि, सूर्य सम महातेजोमय ध्यान मग्न एक अवधूत वेशधारी अलक्षित आवेशयुक्त ध्यान में जाने क्या देखकर वह हंस रहा था ? श्रीगौरांगदेव ने परिकरगण सहित उनको प्रणाम किया।

             🌿 परंतु इधर से कोई उत्तर नहीं मिला, जान गए श्री निमाई चांद कि ये महाशक्ति योग में समाविष्ट है। सब के सब चुप खड़े थे। श्री महाप्रभु आगे बढ़े और सम्मुख आकर खड़े हो गए। मूर्तिमान अप्राकृत मदन, कनकगिरि ज्योति विनिन्दित श्रीगौरांगदेव का विशाल वपु, भारी सुसिनग्ध लहरदार अलकावलि की अद्भुत शोभा थी। ललाट पर विचित्र उध्र्व तिलक, सुकोमल अरुण कमलवत आयत नेत्र, विम्ब विनिन्दित लाल -लाल अधरद्वय,  आजानुलंबित विशाल बाहुदय, वक्षस्थल पर चंपक माला की अद्भुत शोभा मानो सुमेरु पर्वत पर श्रीगंगा की धारा प्रवाहित हो रही हो। पीतवसनयुक्त, कटिदेश, ललिता लिए चारु चरणों में नखों की शोभा मानों बीस चांद ही प्रणाम कर रहे थे और आरती उतार रहे थे। उस असमोद्धर्व माधुरी विग्रह की।  ऐसे अलौकिक विशवाकर्षक सुंदर रूप के साक्षात सामने आने पर कितनी देर श्री निताईचांद का ध्यानावेश टिक सकता था। झट ध्यानावेश छूट गया। नेत्रकमल प्रफुल्लित हो उठे,परंतु देखते ही रहने के सिवाय और कुछ न कर पाए श्रीनिताई। टकटकी बंध गई स्तंभित हो गई सब इंद्रियां श्री निताईचांद की इस अवरूप लावण्य आस्वादन में आश्चर्य की सीमा ना रही।

             🌿श्रीविशंभर प्रभु को श्री निताई चांद का स्वरुप प्रकाश करने के लिए एक युक्ति सूझी। श्रीवास पंडित से बोले -श्रीवास श्रीभागवत का एक श्लोक पढ़ो न।  श्री प्रभु के वचन सुनते ही श्रीवास उच्च स्वर में बोल उठे।

            🌿शरतकाल में श्रीबलराम एवं गोपबालकों के साथ श्री कृष्ण जब वंशी बजाते हुए परम रमणीय श्री वृंदावन में प्रवेश करते हैं। उस समय की सर्वचिता कर्षक छवि का वर्णन है। इस श्लोक में। नटनागर श्री नँदनंदन ने मस्तक पर मोर पुछरचित मुकुट धारण कर रखा है। कानो में पीतवर्ण कमल के सदृश पुष्पों के गुच्छे लटक रहे हैं, वक्ष स्थल पर पचरंगी सुदीर्ध वैजयंती माला सुशोभित है। निज अधरामृत से वंशी को परिपुष्ट कर रहे हैं, असाधारण चरण चिन्हों द्वारा विभूषित सर्वचित आनंदकारी श्री वृंदावन में जब श्री नंदनंदन प्रवेश करते हैं, तब समस्त गोप वृन्द उनका ध्यान करते हैं  ।  

क्रमशः....

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