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क्रम: 2⃣2⃣
                                 
               🌿प्राकृत मदिरा पीने वाले भी सहज में होश में नहीं आते, यह तो अप्राकृत कादंबरी थी श्री कृष्ण प्रेमरस की।  इसका नशा कैसे जल्दी छूट जाता। सब भक्तगण तो अपने घर चले गए। रात को उठ -उठ कर श्रीनिताईचांद हुंकार करते। गर्जना करते। अंत में हुआ यह कि अपने दंड कमंडलु को तोड़कर फेंक दिया। श्री नित्यानंद सन्यासी शिरोमणि थे। दंड कमंडलु धारण करना सन्यासियों का परम कर्तव्य या विधि । कौन जाने क्यों तोड़ डाला दंड कमंडलु को प्रभुपाद ने, वह भी अपने हाथों से ?

           🌿  श्री निताई चांद तोड़ डाले दंड कमंडलु तो आपत्ति क्या हो सकती है ? जीव सन्यास लेते हैं साधन-भजन के लिए और दंड करना धारण उनके लिए विधान है। इसलिए कि मन पर पूरा शासन रहे। दंड उन्हें याद दिलाता रहता है- मन पर, इंद्रियों पर शासन करने की बात। प्रेरणा देता है मन को काबू रखने की। श्री निताई चांद तो ईश्वर है न । परम स्वतंत्र श्री संकर्षण बलराम के लिए दंड कमण्डलु  की दरकार ही क्या ? जिनकी भुरकुटि के इशारे पर अनंत कोटि ब्रम्हांड नियंत्रित रहते हैं। ब्रह्मांड में जब वे श्री गौरांग सुंदर के साथ अवत्तीर्ण होते हैं, उनकी तरह यह भी सन्यास ग्रहण की लीला मात्र करते हैं। अपनी लीला संपादन में श्री भगवान कब, क्या क्यों, करते हैं, कौन जान सकता है? श्री ब्रह्मा ही उनकी लीलाओं का रहस्य जब नहीं जान सकते, तो औरों की क्या सामर्थ्य?

             🌿प्रातः काल श्रीवास पंडित के भाई रमाई पंडित ने देखा टूटा पड़ा है दंड कमंडलू।  विस्मित हो उठे और दौड़ गए श्रीवास के पास। श्रीवास भी घबरा गए और रमाई पंडित को श्रीमनमहाप्रभु के पास भेजा। श्री गौरांग प्रभु उठकर साथ चले आए श्रीवास के घर। उस समय तक भी श्री निताई चांद को बाहर की, तन की कुछ सुध-बुध न थी। प्रभु ने दंड और कमंडलु के टुकड़े अपने श्रीहस्त में उठा लिए और श्री निताई चांद को साथ लेकर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा का स्नान करने को चल दिए। श्रीवासादि सब भक्त भी साथ थे।  श्रीमन महाप्रभु ने अपने हाथों से वे दंड कमंडलु के टुकड़े श्री गंगा में प्रवाहित कर दिए।

क्रमशः...

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