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क्रम: 2⃣3⃣
🌿 गंगा का गंभीर प्रवाह, परंतु श्री निताई चांद अति चंचल हो रही थे। बार-बार श्री विशंभर रोकते हैं, परंतु वे तो मगरमच्छ आदि जलचरों को भी पकड़ने के लिए बार-बार कूदना चाहते हैं। भक्तों के प्राण हिल उठते हैं इनकी यह दशा देखकर। श्री विशवम्बर प्रभु ने सिंह की तरह गर्जते हुए कहा - बन्धो! आज व्यास पूजा का दिन है। स्थिर होकर स्नान करो और शीघ्र घर चलो। श्री विश्वम्बर के यह वचन सुनकर श्रीनिताई झट उठे और स्नान कर महाप्रभु एवं सब भक्तों के साथ श्रीवास भवन पर चले आये। वहां असंख्य भक्तजन आकर व्यास पूजा उत्सव में सम्मिलित हुए। उच्च ध्वनि में सब "श्री कृष्ण!! श्री कृष्ण !! नाम का संकीर्तन करने लगे।
श्रीवास पंडित व्यास -पूजा के आचार्य थे। श्री चैतन्य देव की आज्ञा से सब कार्य साध रहे थे। श्रीवास ने श्री निताई चांद के हाथ में एक अति सुंदर सुगंधित पुष्प माला दी और बोले -"प्रभुपाद! मंत्र पढ़ते हुए यह माला श्री व्यासदेव को समर्पण कीजिए और प्रणाम कीजिए। श्रीनिताई चांद ने हाथ में माला तो ले ली परंतु कुछ अस्पष्ट गुनगुनाने लगे, न जाने क्या कह रहे थे। श्रीवास के वचनों की अनसुनी कर चारों ओर देखने लगे। श्रीवास ने श्री गौरांग प्रभु को जो कुछ दूर विराजमान थे आवाज दी कि प्रभो! यहां पधारो, श्रीपाद निताई तो व्यास पूजन नहीं कर रहे हैं। श्री विश्वम्बर उठ कर सामने चले आए और बोले -"नित्यानंद! माला अर्पण कीजिए न श्री व्यास जी को। प्रणाम कीजिए । श्री नित्यानंद प्रभु ने झट वह माला श्री विश्वम्बर के गले में डाल दी। चंदन लेकर उनके मस्तक पर लगाया और पृथ्वी पर दंडवत प्रणाम किया।
🌿श्री व्यास देव श्री कृष्ण ही तो है और श्रीकृष्ण ही है राधा भावधुति सुवलित- श्री गौर कृष्ण विश्वम्बर। भगवान श्री मत्स्य देव ने मनु महाराज को कहा था- श्री भगवान बोले -कालक्रम से लोक पुराण -प्रस्ताव को ग्रहण नहीं करेंगे। यह बात देखकर मैं व्यास रूप धारण कर- युग -युग में उस का संकलन किया करता हूं। प्रति द्वापर युग में चार लाख श्लोकत्मक पुराण को 18 भागों में विभक्त करके इस पृथ्वी लोक में व्यास रूप से मैं ही प्रकाशित करता हूं । देवलोक में अब भी शतकोटि श्लोकत्मक पुराण एक विग्रह में विराजमान है। वास्तव में पुराण एक ही है वेद की तरह। श्री कृष्ण ही श्रीकृष्ण - द्वैपायन व्यास के रूप में आत्म प्रकट कर उस एक ही पुराण में से केवल चार लाख श्लोक लेकर उन्हें 18 भागो में विभक्त कर प्रकाशित करते हैं। कल्प एवं युगो के अनुसार उतना ही भाग प्रकाशित करते हैं, जिस की उपयोगिता रहती है।
क्रमशः....
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