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क्रम: 2⃣4⃣
🌿अतः वेद पुराणों के कर्ता परब्रह्म श्रीकृष्ण ही श्री वेदव्यास जी के रूप में प्रकट हुए हैं। श्रीनिताई चांद ने श्रीकृष्ण से अभिन्न विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु का पूजन कर श्रीव्यासदेव की पूजा ही संपादित कर दी। जैसे मूल में पानी देने से वृक्ष के पत्ते, शाखाएं सब अंग परिपुष्ट हो जाते हैं। जैसे श्रीकृष्ण- पूजा में समस्त भगवत स्वरूपों, देवी -देवताओं की पूजा हो जाती है। श्री निताई चांद ने ज्योंही विशाल पुष्प माला गले में डालकर श्री गौरांग को दंडवत प्रणाम किया, लीला- शक्ति ने श्रीगौरांग महाप्रभु को षट्भुज अद्भुत स्वरुप में विभूषित कर प्रकट कर दिया। चार भुजाओं में क्रमश शंख, चक्र गदा एवं पदम धारण कर रहे थे तथा दो भुजाओं में हल और मूसल। श्रीनिताई चांद इस रूप छटा का दर्शन कर आनंद से मूर्छित होकर गिर पड़े। समस्त भक्त वृंद परव्योमाधिपति श्रीनारायण अथवा श्री द्वारकाधीश वासुदेव तथा श्रीबलराम के श्री गौरांग स्वरूप के दर्शन कर चमत्कृत हो उठे और सब हाथ जोड़कर प्रभु की सादर स्तुति करने लगे।
🌿 इधर श्री निताई चांद बेसुध पड़े हैं। नितांत स्तम्भित हो रहा है उनका प्रकांड शरीर। देखकर सब भक्तसमुदाय 'रक्ष कृष्ण' 'रक्ष कृष्ण' कहते -कहते भयभीत हो उठे। ज्यों ज्यों 'रक्ष कृष्ण की आति पूर्ण ध्वनि श्री षट्भुज गौरांग के कान में पढ़ती थी वे उतना ही हुंकार करते थे, विशाल गर्जन करते थे। भक्तों की दृष्टि श्री निताई चांद की ओर देखकर श्री षट्भुज महाप्रभु उनके निकट आए और अपने हाथों से उनको उठाते हुए बोले " नित्यानंद उठो उठो" संभालो अपने को।" भैया! चित् को स्थिर करो। सुनो ना अपना चिर - अभिलक्षित नाम संकीर्तन, जिसके लिए तुम ने अवतार लिया है। क्या चाहते हो तुम, आप सब मनोरथ सिद्ध हुए हो? यह प्रेम भक्ति तो तुम्हारी संपत्ति है, तुम प्रेममय हो। निताई चाँद ! जब तक तुम प्रदान न करो, किसी को भी प्रेम प्राप्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
🌿क्योंकि तुम्हारी कृपा के बिना या तुम्हारे प्रति आधे तिल के समान भी द्वेष रहते हुए भजन करने वाला भी मेरा प्यारा नहीं हो सकता। श्री गौरांग के षट्भुज दर्शन कर तथा प्रभु के अति कोमल करकमल का स्पर्श पाकर ये चैतन्य हो उठे। यद्यपि श्री निताई चांद अनंत ईश्वर श्री बलराम है, तथा श्री गौर कृष्ण की भक्ति सेवा ही उनका प्राण है, सदा दास्य भाव का मन में पोषण करते हैं। आज प्राणेश्वर श्री गौरांग की अपार कृपा माधुरी का आस्वादन कर श्रीनिताई चांद कृतकृत्य हो गए। इनके नेत्रों से प्रेमाश्रु की नदी बह निकली। दोनों भाई श्रीगौर -निताई भक्तों के साहित नृत्य पूर्वक कृष्ण कीर्तन करते हुए अपने निवास स्थान पर पधारें।
क्रमशः....
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