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क्रम: 2⃣5⃣
🌺 तुरीयातीत- अवधूत🌺
🌿श्रीनिताई चांद एवं श्री गौरांग प्रभु नवद्वीपवासी अनेक भक्तों के साथ विचित्र लीलाएं करते हैं। श्रीवास पंडित के घर में ही निवास करते हैं, श्री निताई। निरंतर बाल्य- भाव है इनका, श्रीवास के घर में बच्चों की तरह लीला करते हैं। यहां तक कि अपने हाथों से भोजन भी नहीं करते। श्रीवास - गृहिणी माता मालिनी जी ही इनके मुख् में ग्रास देती हैं अपने गोद के पुत्र की तरह। परम पतिव्रता श्रीमालिनी देवी श्रीनिताई चांद के स्वरूप का अनुभव कर चुकी हैं। इनकी कृपा से और निरंतर पुत्र भाव से इनकी सेवा में आनंद लाभ करती हैं।
बड़े नटखट है श्रीविशम्भर, एक दिन श्रीनिवास को साथ लेकर श्रीवास पंडित के घर पहुंचे। अनेक देर तक श्री कृष्ण कथा कहते सुनते रहे। श्रीवास की परीक्षा करने के लिए सहसा बोल -उठे "श्रीवास ! यह नित्यानंद तो अवधूत है, तुमने इसे अपने घर में क्यों बसा रखा है? क्या कूल है इसका, हम कुछ भी तो नहीं जानते हैं, तुम तो परम उदार हो न ? देखो यदि तुम अपनी कुल जाति की रक्षा चाहते हो, तो इसे अपने घर से भगाओ।" श्रीवास कुछ मुस्कुराकर बोले-"प्रभु ! मेरी परीक्षा कर रहे हो,यह आपके लिए उचित नहीं है। श्री गौरांग ! आपका जो एक दिन भी भजन करता है, वही मुझे प्राणों के समान प्रिय है, तब श्री निताई चांद को तुम्हारा देह है ऐसा मेरा विश्वास है। मैं जानता हूं प्रभु! आप स्वयं श्रीनंदनंदन हो और श्रीनिताई चांद श्री बलराम तुम्हारा विलास रूप ही है। प्रभु ! अभिन्न है तुमसे ये।"
🌿 श्री विशंभर -'क्या कह रहे हो तुम आज श्रीवास ? श्रीवास -प्रभु ! कुछ भी कह रहा हूं। परंतु आप यह जान लो यदि श्रीनिताई चांद मदिरा और कामिनी भी स्वीकार करें मेरी जाति ही नष्ट हो जाए, मेरे प्राण ही क्यों न छूट जाए, हे विशंभर! श्रीनिताई चांद के प्रति मेरा अन्यथा भाव नहीं हो सकता।" यह बात श्रीवास के मुख से सुनते ही श्रीविशंभर गर्जना पूर्वक हुंकार करते हुए बोले -"पंडित! क्या कहा तुमने? मेरे निताई चांद के प्रति तेरा इतना विश्वास? इतना अनुराग ? श्रीवास! तुमने मेरे इस गुप्त निताई चांद को पहचान लिया है। तुम पर मैं अति संतुष्ट होकर यह वरदान देता हूं कि - लक्ष्मी भिखारिन होकर नगर- नगर में भिक्षा करती डोले- ऐसा संभव है, परंतु तुम्हारे निकट कभी दरिद्रता नहीं आएगी। श्रीवास! तुम्हारे घर के कुत्ते -बिल्ली पर्यन्त मेरी भक्ति को प्राप्त करेंगे। मैंने निताई चांद को तुम्हें ही सौंप दिया। ऐसा कहकर श्री गौरांग श्रीनिवास के साथ अपने निवास स्थल पर लौट आए।
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