26

           क्रम: 2⃣6⃣
  🌺 तुरीयातीत- अवधूत🌺

               🌿 क्या अपूर्व भंगी है श्रीविशम्भर की! विश्व के प्रति श्री निताई चांद का तत्व कौन प्रकट करता, यदि स्वयं यह न प्रकाश करते। श्रीमनमहाप्रभु ने श्री निताई चांद को अवधूत बताया किसे कहते हैं अवधूत? एक तो तांत्रिक अवधूत होते हैं, जो भ्रष्ट आचरण शील होते हैं। उनके लिए जाति कुल का कुछ पता नहीं होता। मदिरापान और परस्त्री संघ के लिए सचेष्ट रहते हैं। परंतु श्री निताई चांद थे वैदिक अवधूत वेदानुगत अवधूत वे हैं जो सन्यास आश्रम ग्रहण कर तुरियातीत अवस्था को प्राप्त करते हैं। ऐसे अवधूत महापुरुष परम् पवित्र एवं ज्ञानकार वेद पुरुष होते है।  उनका चित सदा आदि नारायण श्रीकृष्ण में लगा रहता है। श्री कृष्ण ही सदा ऐसे अवधूत में अवस्थान करते हैं।

           🌿 इससे स्पष्ट है कि वेदानुगत अवधूत आदि नारायण श्री कृष्ण का परम भक्त होता है। और उसकी श्री कृष्ण में आत्यंतिकी की निष्ठा होती है। वह किसी आश्रम में चिन्ह भी धारण नहीं करता।  वरनाश्रम के धर्म भी पालन नहीं करता। श्री कृष्ण लीला गुण में तन्मयता के कारण वह सर्वत्र अपने प्यारे श्री कृष्ण का अनुभव करता है। फिर उसमें राग द्वेषादि द्वंद अहंकार आदि कोई भी स्थान नहीं रहता। अन्य लोगों के साथ ग्राम्या वार्ता  अथवा श्रीकृष्ण कथा को छोड़कर वह और कोई बातचीत नहीं करता। श्री कृष्ण में प्रगाढ़ निष्ठा होने के कारण उसे किसी विषय की स्मृति तक भी नहीं रहती। ऐसे अवधूत कृष्ण उपासक में वर्णाश्रम धर्म का पालन न करना उसकी इच्छा या विचार के अधीन नहीं होता, बल्कि श्री कृष्ण विषयक तन्मयता के ही कारण ऐसा होता है।

          🌿 किंतु जो स्वयं भगवान श्री कृष्ण का भजन करते हैं और मुक्ति नहीं चाहते ,चाहते हैं केवल श्री कृष्ण प्रेम सेवा, चाहते हैं केवल विशुद्ध ब्रज प्रेम। उन्हें आनुषंगिक रूप से मुक्ति या तुरीय अवस्था को प्राप्त हो ही जाती है। परंतु ब्रज प्रेम की जो उन्हें प्राप्ति होती है वह है मुक्ति से भी परे की परम उत्कर्ष अवस्था, जिसे कहा जा सकता है मायातीत से अतीत की अवस्था या तुरीयातीत अवस्था। तात्पर्य यह है कि जो स्वयं भगवान बृजेंद्रनंदन श्री कृष्ण की उपासना से ब्रह्माआदि के लिए भी सदुर्लभ ब्रज प्रेम प्राप्त करते हैं। वह है तुरीयातीत से भी परम श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त। ऐसे हैं हमारे तुरीयातीत अवधूत। श्री निताई चाँद, जिनके चित में हैं कृष्ण की एकांतिक निष्ठा और कृष्ण प्रेमावेश।  निरंतर निमग्न रहते हैं श्री कृष्ण ब्रज प्रेमसुख सिंधु में।

क्रमशः....

Comments

Popular posts from this blog

99

27

89