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🌺 शची गृह निमत्रण🌺

🌿  क्या जाने वात्सल्य मूर्ति माता शची अपने नटखट गौरांग की लीला ? श्री विश्वंभर स्वप्न की बात सुन कर हंस पड़े और माता से बोले - माँ तुमने बहुत ही शुभ सपना देखा है और किसी को मत कहना। तुम्हारे घर में श्री कृष्ण बलराम की प्रत्यक्ष मूर्ति विराजमान है। मुझे तो तुम्हारे सपने से यह दृढ़ विश्वास हो गया है । मां! मैं रोज रोज देखता था तुम कितना कितना भोग सजा सजा कर रखती थी और फिर वह आधा ही रह जाता था।
  
     🍀  संकोचवश मैं किसी से नहीं कहता था आज मेरा संदेह निवृत्त हो गया है। देखो मां !  अब तुम नित्यानंद को बुलाकर भोजन करा दो। माता शची विशंभर के वचन सुन कर बड़ी प्रसन्न हुई और भोजन की सब तैयारी कर ली । श्री विश्वंभर स्वयं ही श्रीवास के घर श्री निताई चांद को भिक्षा के लिए निमंत्रण देने गए।  श्रीमन महाप्रभु बोले गोस्वामी आज आप मेरे घर प्रसाद भिक्षा करेंगे किंतु एक बात है वहां चलकर कोई चंचलता नहीं करना । श्री निताई चांद ने दोनों कानों को हाथों से पकड़ा और भोले विष्णु! विष्णु! चंचलता तो पागल करते हैं। निमाई तुमने मुझे पागल समझ रखा है क्या ? तुम सबको अपने जैसा समझते हो। इस प्रकार कहकर दोनों हास परिहास करते हुए कृष्ण कथा कहते-कहते घर आ पहुंचे । सेवक ईशान ने चरण धोने का जल दिया। दोनों भाई एक स्थान पर भोजन करने के लिए बैठ गए ।

       🌹 मानो कौशल्या महारानी के घर श्री राम लक्ष्मण ही भोजन के लिए विराजमान हो। माता शची देवी हर्ष पूर्वक परिवेषण करने लगी । माता ने दो पात्रों में परिवेषण किया परंतु वह भोजन 3 पात्रों में विभक्त हो गया। श्री निमाई निताई हंसने लगे माता तो दो पात्र रखकर बाहर पाठशाला में चली गई उसने नहीं देखा कि भोजन 3 पात्रों में बट गया है । यह सब खेल था लीला शक्ति या ऐश्वर्य शक्ति का, जो आज इन दोनों की इच्छा से ही कार्य कर रही थी ।

क्रमशः

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