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क्रम: 3⃣
               स्वयं भगवान सर्वावतारी श्री कृष्ण जब नवद्वीप में श्री कृष्ण चैतन्य चंद्र के रूप में आविर्भूत होते हैं उनके विलास रूप अथवा आद्य कायव्यूह रूप में श्री बलराम उनके साथ उनकी लीलाओं की सहायता के लिए श्री नित्यानंद रूप में आविर्भूत होते हैं ।
श्रीमन नित्यानंद प्रभु या श्री निताई चांद अभिन्न तत्व है श्री चैतन्य देव से । दो विग्रहों में श्री चैतन्य देव ही आत्म प्रकट  कर अनेक लीलाएं करते हैं । तात्पर्य यह है कि जो श्री बलराम है वही श्री निताई चांद है । वही मूल शंकर्षण है । श्री बलराम कृष्ण की क्या-क्या सेवा किस किस रूप से संपादन करते हैं , उसकी विस्तृत आलोचना करने से ही श्रीनिताई चांद का किंचित तत्त्व उनकी कृपा से समझा जा सकता है ।
      श्रीकृष्ण जी ने 4 रूपों में आत्म प्रकट कर वहां की लीलाएं संपादन करते हैं वह चार रूप इस प्रकार है-

1-  श्री वासुदेव -  ब्रजेंद्रनंदन श्री कृष्ण का एक प्रकाश स्वरूप है श्री वासुदेव । जो देवकी वसुदेव के पुत्र रूप में आविर्भूत होते हैं । श्री वासुदेव कभी द्विभुज है कभी चार भुजाएं धारण करते हैं । इनका क्षत्रिय वेश  है एवं यह अपने को क्षत्रिय मानते हैं।

2- संकर्षण -  यह बलराम का प्रकाश स्वरूप है । अभिन्न है स्वयं रूप श्री बलराम से ।

3 -प्रद्युम्न -  श्रीकृष्ण के ही आविर्भाव विशेष हैं जो रुक्मणी कृष्ण के पुत्र रूप में आविर्भूत होते हैं।

4 - अनिरुद्ध - यह भी श्रीकृष्ण का आविर्भाव विशेष है जो श्री प्रद्युम्न के पुत्र एवं श्री कृष्ण के पौत्र रूप में आविर्भूत होते हैं।
              
क्रमशः....

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