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🌙 *श्री निताई चाँद*🌙

      क्रम: 3⃣1⃣
            
🌹श्री मालिनी का वात्सल्य🌹
         श्री निताई चांद श्रीवास पंडित के घर में ही निवास करते थे, श्रीवास को पिता मानते और पिता जी कहकर बुलाते थे एवं श्री मालिनी देवी को माता । वह केवल माता बुलाते ही न थे श्री मालिनी देवी जी उन्हें निरंतर अपना शिशु ही मानती थी निरंतर बाल्य भाव था श्री निताई चांद का मालिनी देवी के प्रति ।

        🌿  बाल्य भाव भी ऐसा की मालिनी देवी के स्तनों से टपकते दूध का पान करते थे वे। माता मालिनी के शुष्क स्तन थे परंतु जब बाल निताई की स्तनपान करने की इच्छा होती स्तन का स्पर्श करते ही दूध की धारा बह निकलती माता मालिनी के स्तनों से ।

कभु नाहि दुग्ध , परशीले मात्र हय।
ए सब अचिन्त्य शक्ति मालिनी देखय।।

      🌹 माता मालिनी स्वयं विस्मित रह जाती श्री निताई शिशु की इस अचिंत्य शक्ति को देख कर। अचिंत्य शक्ति के भंडार तो है ही निताई चांद । स्वरूपत: श्री बलराम है न ईश्वर तत्व हैं। नर लीला में ईश्वर को अपने ऐश्वर्य का ज्ञान नहीं रहता । वह नहीं जान पाते कि वह ईश्वर हैं परंतु स्वरूप शक्ति, ऐश्वर्य शक्ति तो अपनी सेवा का अवसर देखा करती है।

        🌹 ईश्वर के बिना जाने, बिना चाहे वह अपनी सेवा संपादित करती रहती है । शुष्क स्तनों से दूध कैसे आता था ,कहां से आता था यह बात समझना अलौकिक बुद्धि के नितांत परे है। युक्ति तर्क द्वारा कोई इसका निर्णय कैसे कर सकता है? अचिंत्य शक्ति है ईश्वर तत्व में। उनकी समस्त लीला शक्ति, ऐश्वर्य शक्ति अचिंत्य है अप्राकृत है मायातीत है। मायिक जगत में बुद्धि के द्वारा युक्ति तर्क से इस रहस्य को नहीं जाना जा सकता अचिंत्य का अर्थ भी यही है--

अचिंत्या: खलु ये भावा न तान्तरकेँन योजयेत।
प्रकृतिभ्य: परम यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ।।

    श्री निताई चांद की अचिंत्य शक्ति का ऐसा अद्भुत प्रभाव देखते हुए भी मालिनी देवी कभी इस रहस्य को किसी से ना कह पाती थी यहां तक कि श्री विश्वंभर भी माता मालिनी के इस अभूतपूर्व वात्सल्य को तथा निताई चांद के बाल्य भाव को ना जान सके श्री निताई समय-समय पर अवसर पाकर श्री गौरांग श्री निताई चांद से बार-बार इतना अवश्य बहुत से नित्यानंद देखो तुम चंचलता और किसी से झगड़ा यहां नहीं करना श्री निताई चांद हंस देते और विष्णु विष्णु कह देते कभी कभी अपने पर जब उतर आते तो सुना भी देते निमाई तुम मेरी शिकायत कहीं ना सुन पाओगे तुम तो अपने जैसा किसी को नहीं समझते हो विश्वंभर मैं अच्छी तरह जानता हूं तुम निताई तुम चंचल हो कहो तो कुछ क्या देखी है चंचलता मेरी तुमने श्री निताई चांदनी पूछा सारे घर में अन्य व्यंजन तुम फैला देते हो जहां इच्छा करते हो विशंभर ने कहा श्री निताई चांद बोले ठीक तुमने मुझे पागल समझ रखा है ऐसी बात कह कर मुझे कहीं रिक्शा भी ना पानी देना तुम मुझे अपने घर मत निमंत्रण देना भविष्य में श्री विश्वंभर मैया भैया तुम्हारी अब कीर्ति के डर से तुम्हें शिक्षा देता हूं वस्तुतः हमारे श्री निताई चांद अवधूत शिरोमणि तो सही उन्हें श्री कृष्ण प्रेम आवेश मैं बावला ज्ञान रहता ही कहां था प्राय देहाध्यास से रहते थे विशेषता नवदीप में तो उन्हें बाल्य भावावेश था चाहे वह उस समय 30 32 वर्ष के थे वाली आवेश में जहां भिक्षा करते छोटे बच्चों की तरह सब जगह चावल भात आदि बिखेर देते। 🌺

🌿

क्रमशः

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