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क्रम: 3⃣2⃣
*श्रीमालिनी का वात्सल्य*
🌹यहाँ तक कि उन्हें अपने कटिवस्त्र का भी होश न रहता था। यह बात श्रीमन महाप्रभु के कानों में पड़ा करती थी।इसलिए वे समय समय पर इनको चंचलता छोड़ने की बात कहा करते थे।परंतु वह नशा, वह आवेश कच्चा न था, प्राकृत-बनावटी न था।सुन लेते परन्तु थोड़ी देर के बाद फिर वैसे के वैसे। बालक की स्वभावगत चंचलता छुड़ा सका है आज तक कोई ?
🌹महाप्रभु की बात सुन ली कह दिया -'प्रभो !!! अच्छा है, आप मुझे शिक्षा दिया करो ,मेरी अपकीर्ति न हो। ऐसा करने के बाद अभी दो तीन क्षण हुए थे कि श्रीनिताई चाँद ने अपना कटिवस्त्र उतारा और अपने सिर पर गोपों की तरह बाँध लिया और कृष्ण भावावेश में लगे नाचने। श्रीगदाधर, श्रीनिवास, श्रीहरिदास सबके सब भक्तगण हँस-हँस के लोट-पोट हो गए। सब बोले- 'प्रभो ! तुम्हारी शिक्षा का फल है यह कि अवधूत सबके सामने दिगम्बर हो नाच रहा है। श्रीविश्वम्भर प्रभु ने स्वयं पकड़ कर अपने हाथों से उन्हें कटिवस्त्र धारण कराया। ऐसी अलौकिक लीला श्रीनिताईचाँद की।
कपडा पहराएँ श्रीविश्वम्भर या श्रीनिवास और भात खिलाए तो माता मालिनी ।।
अपने हाथों से कुछ करते नहीं अवधूत-शिरोमणि।
🌹एकदिन एक कौआ माता मालिनी के आंगन से ठाकुर सेवा की घी की
कटोरी लेकर उड़ गया। वृक्षों की डाल-डाल पर बैठता उड़ता न जाने कहाँ चला गया। थोड़ी देर में वह उस कटोरी को कहीं डालकर फिर घर की दीवार पर आ बैठा। मालिनी देवी उसे खाली मुँह देखकर बहुत दुःखी हुई।जितनी चिन्ता उसे उस घी-पात्र की नहीं थी, उससे अधिक कहीं श्रीवास
पण्डित के क्रुद्ध होने तथा कठोर आचरण की थी। क्योंकि श्रीवास पण्डित किसी सेवा कार्य में लापरवाही से नुकसान होने पर अति क्रोधित हो उठते थे।विशेषतः यह कटोरी थी श्रीभगवान् की आरती बत्ती रखने की । अतः मालिनीदेवी भय से रोने लगी। इतने में श्रीनिताईचाँद घर आ पहुँचे। मालिनीदेवी को रोता देख, दुःख का कारण पूछा। घी की कटोरी कौए द्वारा ले जाने की बात सुनकर प्रभुपाद जोर से हँस पड़े और बोले-“माँ। इसमें रोने और चिंता करने की क्या बात है, अभी वही की वही कटोरी ला देता हूँ मैं।
क्रमशः
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