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कर्म: 3⃣3⃣

*श्रीमालिनी का वात्सल्य*

     🌹श्रीनिताई चाँद ने हँसते हुए कौवे की तरफ देखा और बोले ," भैया!ले आए वह कटोरी" । सबके हृदय में बसते हैं न श्रीनिताई चाँद अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में। उनकी आज्ञा का उल्लंघन कैसे हो सकता है।प्रभु की वाणी सुनते ही कौवा उड़ गया। थोड़ी देर में मुँह में कटोरी ले आया और आंगन में गिरा दी । मालिनी-माता यह देख कर अति प्रसन्न हो उठी। अच्छी प्रकार जानती हैं वह श्रीनिताईचाँद की महिमा । “यमलोक से गुरु के मृतक पुत्र जो ला सकते हैं, जिनके नाम से अनादि अविद्या का ध्वंस हो जाता है,जो अपने एक अंश से समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर सरसों के दाने की तरह धारण करते हैं, उनके लिए कौए से एक कटोरी पुनः प्राप्त करना-कौन सी बड़ी बात है ?" इस प्रकार अनेक स्तुति करने लगी माता मालिनी ।

     🌹माता की ऐश्वर्य बुद्धि देख झट श्रीनिताईचाँद हँसने लगे और एक छोटे बच्चे की तरह ‘ऊआँ-ऊआँ’ कर “मुझे भूख लगी है" कह कर मालिनी माता के गले चिपट गए और मालिनी का स्तन पान करने लगे अचिन्त्य हैं श्रीनिताईचाँद के चरित | कैसा परम घनिष्ट है अहर्निश आपका भावावेश ? केवल तत्त्वज्ञ ही इस रहस्य को जान सकते हैं उनकी ही अनुकम्पा से।

    🌹श्रीश्रीचैतन्यभागवत के व्यास श्रीवृन्दावनदास ठाकुर ने श्रीनिताईचाँद के
तत्त्व को कितने सरल किन्तु गूढाशय में व्यक्त किया है।

*इष्टदेव वन्द मोर नित्यानन्दराय।*
*चैतन्य-कीर्तन स्फुरे यांहार कृपाय।।*
*सहस्र वदन वन्दौं प्रभु बलराम ।*
*यांहार सहस्र मुख कृष्ण यशोधाम।।*
*ये प्रभु चैतन्य यश सहस्रेक-मुखे।*
*गाइते आछेन प्रभु संकर्षण रूपे ।।*
*महारत्न थुइ येन महा-प्रिय-स्थाने ।*
*यशोरत्न-भाण्डार श्रीअनन्त वदने।।*

     🌹उन्होंने कहा है। अपने इष्ट देव दीक्षा गुरु श्रीमन्ननित्यानन्द राय के चरणों में नमस्कार करता हूँ, क्योंकि की कृपा से ही श्रीचैतन्यदेव के नाम गुणगान की स्फूर्ति होती है।  उन श्रीबलराम प्रभु की मैं वन्दना करता हैं। उनकी वन्दना एवं कृपा प्राप्ति से ही श्रीकृष्णचैतन्य गुण- कीर्तन की स्फूर्ति सम्भव है, क्योंकि उनके हजारों मुख ही श्रीकृष्ण नाम गुण कीर्ति के भण्डार हैं। वे नित्य नवीन नाम गुणों का गान करते रहते हैं। उसी प्रकार वही श्रीसंकर्षण श्रीनिताईचाँद अनन्तदेव के रूप में श्रीश्रीकृष्णाचैतन्यदेव के नाम गुण लीलाओं का नित्य नवीन गान करते रहते हैं। अतः उनकी कृपा से ही श्रीकृष्णचैतन्य नाम गुणगान की रति सम्भव है, अन्यथा नहीं। जैसे बहुमूल्य रत्न को परम गुप्त आत्मीय स्थान पर रखा जाता है, उसी प्रकार श्रीमहाप्रभु ने अपने नाम गुण कीर्तन रुप महारत्न को अपने परम आत्मीय अपने प्रिय श्रीअनन्तदेव के मुख में सुरक्षित रखा है, जो श्रीनिताई चाँद के अंश हैं। अतः श्रीनिताई चाँद की कृपा के बिना श्रीकृष्ण-नाम गुण गान रूप महारत्न की प्राप्ति नहीं हो सकती।

     🌹 श्रीवृन्दावदास ठाकुर महाशय ने यह भी वर्णन किया है कि जो श्रीनिताईचाँद -संकर्षण का गुणानुवाद गान करते हैं, जो उनकी शरण ग्रहण करते हैं उन पर श्रीमहादेव पार्वती भी अति प्रसन्न होकर उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। श्रीबलराम संकर्षण इष्ट देव हैं श्रीमहेश पार्वती के। श्रीपार्वती एवं असंख्य दासियों से सेवित श्रीमहादेव नित्य श्रीसंकर्षण की
अर्चना करते हैं।

क्रमशः

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