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क्रम: 3⃣4⃣
*शचीमाता-छलना*
🌹एक दिन श्रीविश्वम्भर प्रभु लक्ष्मी-स्वरूपा श्रीविष्णुप्रिया जी के साथ
अपने निवास स्थान पर विराजमान थे। श्रीविष्णुप्रिया जी सुन्दर पान लगाकर
श्रीगौरसुन्दर के हाथ में दे रही थीं। माता शची के आनन्दकी सीमा न रहती,जब वह श्रीविश्वम्भर विष्णुप्रिया जी को एक साथ बैठा देखती थीं। श्रीविश्वम्भर शचीमाता के मन की बात जानकर, उसका सुख सम्पादन करने के लिए अपनी आह्लादिनी–शक्ति श्रीविष्णुप्रिया जी के साथ समय-समय पर मिलकर बैठे रहते ।।इतने में आ पहुंचे वहाँ परम चञ्चल अवधूत-शिरोमणि श्रीनिताईचाँद ।असन्–वसन की कुछ सुध नहीं, झूठा रोष है। आते ही बोले-"विश्वम्भर ! मैं तो यहाँ से जा रहा हूँ।
श्रीगौरांग-‘ऐसा क्यों ?
श्रीनिताईचाँद-कुछ खाने को ही नहीं मिलता यहाँ ।”
श्रीगौरांग-(हँसकर) निताई । बैठो, वसन तो सम्भालो।”
श्रीनिताईचाँद-मैं भोजन करूंगा।
🌹भाव विभोर ऐसे उन्मत हैं श्रीनिताईचाँद, श्रीविश्वम्भर कुछ कहते हैं और ये कुछ जबाब देते हैं। श्रीमन्महाप्रभु ने स्वयं उठ कर इनके वस्त्र सम्भाले ।
मुस्करा दिये थे। माता शची इनके चरित्रों को देख कर हँसती हैं। विश्वरूप की तरह इन्हें अपना बड़ा पुत्र करके मानती हैं। कभी-कभी ये उसे विश्वरूप की आकृति दिखा भी देते हैं । वैसी ही वाणी इनके मुख से सुनकर,चकित हो उठती हैं। कुछ देर में जब श्रीनिताईचाँद का भावावेश हटा तो शची माता ने पाँच संदेश (रसगुल्ले ) इन्हें भोजन के लिए दिए।श्रीनिताई चाँद ने एक तो मुँह में डाला और चार उठाकर फेंक दियें।
"हाय हाय यह क्या कर दिया बावरे' शची चिल्ला उठीं।
निताई बोले 'पाचों एक जगह क्यों दे दिये तुमने मुझे ?
और नहीं हैं मेरे पास, अब क्या खायेगा ?" शची ने पूछा।
श्रीनिताईचाँद ने कहा अवश्य तुम्हारे पास और रखे होंगे। देखो तो सही घर में।
🌹शची अति विस्मित हो उठीं, जब जाकर घर के भीतर उसने चार सन्देश
और भी रखे देखे-'अरे ये कहाँ से आ गए ?' शचीमाता ने ज्यों हीं इधर देखा तो श्रीनिताईचाँद वही फेंके हुए चार सन्देश साफ करके भोजन कर रहे थे।शचीमाता आश्चर्य चकित हो गई, और पूछा-"अरे निताई । ये कहाँ से ले आया ?
निताई बोले-'माँ तुम्हें दुःखी जानकर वहीं फेके हुए फिर उठा लाया।
🌹शची माँ ने कहा- “नित्यानन्द ! क्यों तू मुझे ठगता है ? मैं जान गई तू ईश्वर हैं माया से छुड़ा मुझे।” ऐश्वर्य का यह स्थान कहाँ ? सुनते ही बाल्य भाव में माता-शची के चरण पकड़ने को दौड़े। माता भागी वहाँ से और आप पीछे-पीछे भागने लगे। कैसी अद्भुत महिमा खेल-खेल में सब को चकित
कर देते हैं कौतुकी श्रीनिताईचाँद । कोई भी इनकी महिमा को नहीं जान सकता।
🌹जिन्होंने भक्तिमार्ग का अनुसरण किया है, वही पुण्यवान-जन ही निताईचाँद के चरित्रों को जान सकते हैं उनके सफल कार्य सिद्ध होते हैं। और जिनके पाप ही संचित हैं, वे कभी भी श्रीनिताईचांद के आचरण एवं चरित्र को नहीं जान सकते, उन्हें अच्छे भी नहीं लगते। वे निन्दा करते हैं।ऐसे लोगों को देखकर गंगा भी उनसे दूर भाग जाती है। उनके पाप का कोई भी उपाय नहीं है।
*एइ मत नित्यानन्द चरित्र अगाध ।*
*सुकृतिर भाल, दुष्कृतिर कार्यवाध ।।*
*नित्यानन्द निन्दा करे ये पापिष्ठजन।*
*गंगार ताहारे देखि करे पलायन ।।*
क्रमशः
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