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        क्रम :3⃣5⃣

*श्रीकृष्णाभिन्न-नित्यानन्द*

    🌹एक दिन निताईचाँद भगवान् श्रीविश्वम्भर के घर पर आए। वे आनन्दपूर्वक विराजमान थे। दर्शन कर इनके नेत्रों से अजस्त्र प्रेमाश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और जोर-जोर से हुँकार करने लगे शरीर की सुधबुध न रही।हे नदिया-विहारि ! आप ही मेरे ईश्वर हो, आप ही मेरे सर्वस्व हो ऐसा बार-बार कहने लगे। श्रीविश्वम्भर इनकी प्रेम दशा को देखकर मन्द-मन्द
मस्कराए। प्रभु ने अपने मस्तक का वस्त्र उतार कर इनको पहनाया और दिव्य
चन्दन-गन्ध इनके अंगों पर लेपन किया। अति सुन्दर विशाल पुष्पमाला प्रभु ने श्रीनिताईचाँद के गले में डाल दी एवं अपने सन्मुख इन्हें उच्च आसन पर बैठा दिया। ये बाह्य ज्ञान–शून्य हो अवस्थान कर रहे थे। चारों ओर भक्तगण यह सब कौतुक देख रहे थे । वेदस्तुत्य भगवान् श्रीविश्वम्भर श्रीनिताईचाँद की स्तुति करने लगे-

     हे नित्यानन्द ! आप केवल नाम से ही नित्यानन्द नहीं हो, स्वरूप से भी आप नित्यानन्द हैं, नित्य अक्षय आनन्दमय हैं। आपका देह भी नित्य आनन्दघन है। आप ब्रजबिहारी श्रीबलराम हैं। हे नित्यानन्द ! आपका भ्रमण, भोजन ,कथन यावतीय आचरण है, सब नित्यानन्दमय है अप्राकृत आनन्द को छोड़कर आपमें, आपके आचरण में कुछ भी नहीं है। हे निताईचाँद आपको जानने की शक्ति मनुष्य में कहाँ ? यह परम सत्य है-जैसे श्रीकृष्ण, वैसे ही आप हो।

*तोमार बूझिते शक्ति मनुष्येर कोथा ?।।*
*परम सुसत्य–तुमि यथा कृष्ण तथा।।*

(श्रीचैतन्यभागवत २-१२-१६)
   
     🌹हे निताईचाँद ! आज आप हम सबकी एक अभिलाषा पूर्ण करें। अपनी
एक कोपीन हम को प्रदान कीजिए। इतना कहकर श्रीमन्महाप्रभु ने इनकी एक कोपीन ले ली और उसको फाड़कर उसके छोटे-छोटे अनेक टुकड़े कर लिए। भक्त मण्डली को अपने हाथों से प्रभु ने एक एक टुकड़ा देते हुए कहा-“सब अपने-अपने मस्तक पर इस कोपीन खण्ड को बाँध लीजिए। यह साधारण वस्त्र नहीं इसकी बड़े-बड़े योगेश्वर भी इच्छा करते हैं।विष्णु-भक्ति केवल प्राप्त होती है इन श्रीनित्यानन्द की कृपा से ये श्रीकृष्ण की पूर्णशक्ति हैं। श्रीकृष्ण का द्वितीय विग्रह हैं ये । श्रीकृष्णाभिन्न हैं। श्रीकृष्ण के संगी, सखा
बन्धु–भाई हैं ये । शयन, भूषण, आसन, छत्र, पादुका श्रीकृष्ण का सब कुछ यही
श्रीनित्यानन्द राम हैं। हे भक्तवृन्द ! श्रीनिताईचाँद श्रीकृष्ण के क्या नहीं हैं ?
अर्थात सर्वस्व हैं उनके ।' व्रज के मूल संकर्षण बलराम ही तो हैं ये।श्रीबलराम मूल–भक्त अवतार हैं। अनन्त चतुयूंह के संकर्षण, परव्योम–चतुर्व्यह संकर्षण के अंश पुरुषावतार, उनके समस्त अंशावतार इन्हीं श्रीनिताईचाँद के अंश हैं। इनकी कृपा से सृष्टि का सृजन,पालन एवं प्रलय होता है।

     🌹समस्त पुरुषावतारों में श्रीकृष्ण-भक्तभावं विद्यमान है और वे श्रीकृष्ण की ये सब अंश-सेवा सम्पादन करते हैं, परन्तु श्रीनिताईचाँद अंशी सेवा-सर्वातिशायी सम्पूर्ण सेवा विधान करते हैं। श्रीनिताईचाँद श्री वैभव प्रकाश हैं। वे काले हैं, ये गोरे हैं-इतना भेद है, वरन ये तो दूसरे श्रीकृष्ण ही हैं।

*वैभव प्रकाश कृष्णेर श्रीबलराम् ।*
*वर्ण भेद, सब कृष्णर स्मान।*
(श्रीचै० चरितामृत २२०४:)

      🌹हे भक्तवृन्द !स्वरूप तत्त्व में स्वयं श्रीकृष्ण के बाद श्रीबलराम -श्रीनिताई चाँद
का स्थान है। कृष्ण-द्वितीय स्थानीय हैं ये हमारे श्रीनिताईचाँद कृष्ण-द्वितीय स्थानीय होते हुए भी ये कृष्ण सेवा में अद्वितीय हैं। वेदों से अगम्य हैं इनके चरित्र। परमदयालु मूर्ति श्रीनिताईचाँद सब के पिता-माता, रक्षक एक मात्र हैं। इनका सब कुछ कृष्णरसमय है, इनकी सेवा से ही श्रीकृष्ण भक्ति की प्राप्ति होती है-ऐसा मेरा निश्चय है।

क्रमशः

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