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क्रम:3⃣6⃣
*श्रीकृष्णाभिन्न-नित्यानन्द*
🌹श्रीमहाप्रभु ने आगे कहा-“आप सब इस कोपीनखण्ड को धारण करो और श्रद्धा एवं महायत्न पूर्वक इसकी पूजा करो।” श्रीनिताई चाँद का चरणामृत ग्रहण करो।”
🌹फिर क्या था, सबने अपने-अपने मस्तक पर उन कोपीन खण्डों को बांध
लिया और ले-लेकर पान करने लगे श्रीनिताईचाँद का चरणजल। श्रीअवधूत शिरोमणि यह सब कौतुक देख रहे हैं, हंस रहे हैं बैठे-बैठे, परन्तु कुछ भी तो नहीं जानते यह हो क्या रहा है? श्रीनिताईचाँद आसन पर विराजमान थे।श्रीमन्महाप्रभु इनके चरण धो-धोकर सब भक्तों को चरणजल लुटाने लगे।मस्तक पर धारण कर सब उसे पान करने लगे। उन्मत्त हो उठे चरणामृत पान करते ही, हरि-हरि बोल’ की उच्च ध्वनि होने लगी। अपने जीवन को धन्य धन्य माना सबने मानो तत्क्षण ही सबके सब कृष्ण भक्ति प्राप्त कर विभोर हो उठे हैं। चञ्चल शिरोमणि का पादोदक उन्हें स्थिर कब रहने देता ?उठ खड़े हुए सब भक्त और श्रीकृष्ण-कीर्तन आरम्भ कर दिया। विह्वल होकर श्रीकृष्ण कीर्तन में विभोर हो उठे। रह सकते थे श्रीगौरांग इस कृष्ण-कीर्तन मंच को देखकर ?विशाल भुजदण्ड उठाकर बीच में वे नाचने लगे। अब तो श्रीनिताई चाँद को भी चेतना आई। श्रीकृष्णरस में डूबे व्यक्ति को, कृष्ण-भावावेश में मूर्छित व्यक्ति को कृष्ण-कीर्तन ही तो चेतन कर सकता है। बाहर के उपचार उसे थोड़ा होश में ला सकते हैं? आ गए श्रीनिताई चाँद भी उठकर सिंहासन से और श्रीविश्वम्भर की दोनों भुजाओं को अपनी भुजाओं के साथ ऊपर उठा "कृष्ण- कृष्ण" कह नृत्य करने लगे। चारों ओर भक्तों ने जय जय ध्वनि उठी आकाश-वातास। फिर क्या था?
*एवं व्रतं स्वप्रियनामकीत्र्या जातानुरागो दृढ़चितडवैः ।*
*सत्यथो रोति रोदिति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोक बाह्यः ।।*
🌹कोई रो रहा है, कोई चिल्ला रहा है, तो कोई विहल होकर पछाड़े खा रहा है। कोई हँस रहा था, कोई नाच रहा था। कोई उन्मत्त हो रहा था।स्वामी–सेवक, भक्त-भगवान् दोनों एक जगह कृष्ण-कृष्ण' कह नृत्य करते हुए उन्मत्त हो रहे थे।
🌹यह संकीर्तन-लीला क्या तभी ही हो रही थी ? अब नहीं है ? ना, ना ऐसी बात नहीं है। इन लीलाओं का परिच्छेद नहीं है। केवल 'आविर्भाव और तिरोभाव' कहकर ही वेद वर्णन करता है। अब भी श्रीगौरांग-श्रीनिताईचाँद के साथ भुजा उठाकर कृष्ण-कीर्तन रास में नित्य नित्यानन्द का सागर
उद्वेलित कर रहे हैं। भाग्यवान नित्य उसका दर्शनकर जीवन लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
🌹 श्रीमन्महाप्रभु ने अन्त में अब भक्तवृन्द से कहा- "इस कृष्ण-द्वितीय श्रीनित्यानन्द स्वरूप की जो श्रद्धा सहित भक्ति करता है, वही मेरी भक्ति करता है। जिसका तिलार्द्ध भी द्वेष है श्रीनिताईचाँद के प्रति, वह भक्त होकर भी मेरा भक्त नहीं। वह कदापि कृष्णभक्त नहीं। अहो ! जिसके शरीर में श्रीनिताईचाँद की अंग वायु भी स्पर्श करती है, श्रीकृष्ण उसके पीछे-पीछे फिरते हैं-
*तिलार्द्धको इहान याहार द्वेष रहे।*
*भक्त हइले से आमार प्रिय नहे ।।*
*इहान वातास लागिवेक यार गाय।।*
*ताहारेउ कृष्ण ना छाड़िव सर्वथाय ।।*
(श्रीचैतन्यभागवत १।१२।५६-५७ ।।)
क्रमशः
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