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क्रम:3⃣7⃣

   *जगाई मधाई उद्धार*

   🌹जाने क्या सूझी एक  दिन करुणा-पारावार श्रीगौरांग को ? अचानक समस्त भक्तों में बैठे बैठे बोल उठे - "प्राण -निताई चाँद ! प्यारे हरिदास ! आप दोनों घर-घर जाकर मेरी यह आज्ञा सुनाओ-

*बोल कृष्ण, भज कृष्ण, लह कृष्ण नाम*
*कृष्ण माता,कृष्ण पिता, कृष्ण धन धाम*

   🌹"श्रीकृष्णनाम उच्च संकीर्तन करो, सब श्रीकृष्ण का भजन करो और हर समय श्रीकृष्ण जप करो-श्रीकृष्ण ही समस्त जीव-जगत के पिता-माता ,धन -सम्पति हैं"।इतना ही नहीं आप दरवाजे-दरवाजे जाकर यही भिक्षा करो और श्रीकृष्ण भजन की शिक्षा सब लोगों को दो-

*प्रति घरे धरे गिया कर एई भिक्षा।*
*"कृष्ण भज, कृष्ण वोल, कर कृष्णा शिक्षा ।।”*

            🌹 अचंभित हो उठे श्रीनिताईचाँद और श्रीहरिदास और हाथ जोड़कर खड़े रहे ,श्रीविश्वम्भर ने कहा- "और कुछ भी आपको बोलना, बुलवाना न है, किसी से कुछ वाद-विवाद नहीं करना है भिक्षा करनी है। भिक्षा अति विनय और कातर-भाव से। दिन ढलने पर मुझे सब वृतान्त कहना हैं। जो आपको यह भिक्षा नहीं देता, उससे मैं स्वयं भुगत लूँगा-चक्र से उसका मस्तक ही छेदन कर दूंगा।”

     🌹यह श्रीगणेश था नवद्वीप-वासियों के प्रति प्रत्यक्ष भाव से कृपा करने का। पहला दिन था जब करुणामय अपनी करुणा विस्तार के लिए ऐसी आज्ञा और ऐसे वचन कह रहे थे । वस्तुतः करुणा और ऐश्वर्य शक्ति ही बोल रही थी, प्रभु नहीं । सुनकर सब वैष्णव-मण्डली हँस पड़ी। परन्तु श्रीविश्वम्भर की आज्ञा टालने का साहस किस को ? आज्ञा शिरोधार्य कर श्रीनिताईचाँद और श्रीहरिदास दोनों चल पड़े। रास्ते में आकर दोनों आज फूले नहीं समा रहे थे, खिलखिला उठे। एक-एक घर के द्वार पर आकर कहते हैं-"अरे भाई ! बोल कृष्ण, भज कृष्ण, गाओ कृष्ण नाम | प्राणधन-जीवन श्रीकृष्ण कहो न।” दोनों ही तो संन्यासी विरक्त वेश में हैं। जिस घर पर आवाज देते हैं।कुछ न कुछ अन्न आटा -चावल लेकर कोई घर के दरवाजे पर आता है ।

     🌹अलौकिक भिखारी हैं ये दोनों-“न भाई न। चावल-आटा नहीं चाहिए।एक बार “कृष्ण बोलो कृष्ण भजो चमत्कृत हो उठते हैं नर-नारी। ये कैसे संन्यासी ? सुजन हर्षित हो उठते हैं, एक बार नहीं, बार-बार बोलते हैं-कृष्ण कृष्ण, कृष्ण ।” आगे चल देते हैं दोनों कष्ण नाम के भिखारी।जगत एक तमाशा है ये दोनों एक और तमाशा सा बन गए। अद्भुत भिक्षा मांग, अद्भुत स्वरूप रूप। स्वाभाविक था अनेक लोगों में अनेक बात का उठना।जितने मुँह उतनी बातें-यह तो जगत की नीति है।कोई-कोई तो संतुष्ट होकर कहते हैं-"बाबा!हाँ, हाँ हम नित्य कृष्ण बोलेंगे, कृष्ण-भजन करेंगे। कोई-कोई बोल उठता है-यह दोनों मन्त्र-दोष से पागल हो गए हैं।मन्त्रार्थ की उपलब्धि के लिए मंत्रजप में चित्त की एकाग्रता प्राप्त करने करने के लिए जैसे ठीक प्रकार से प्राणायाम का अनुष्ठान न कर पाने वाले मन्त्रदोष -क्षिप्त, विकृत-मस्तिष्क हो जाते हैं, वैसी ही इनकी दशा। आगे जाओ रे, हमें भी अपने सा पागल करने आये हो क्या?

क्रमशः

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