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क्रम:3⃣8⃣

*जगाई -मधाई उद्धार*

   🌹श्रीनिताईचाँद हरिदास हंस देते आगे चल देते। हंसते थे इसलिए कि स्वयं माया के पागल हैं और बताते हैं हमें पागल।

    🌹हाय ! हाय ! जिन लोगों को श्रीवास आँगन में प्रभु के नृत्य संकीर्तन में नहीं आने दिया जाता था, दरवाजा बन्द कर दिया जाता था, उन दुष्कृति लोगों के दरवाजे पर जाते ही वे तो आगबगोला हो उठते-“मारो मारो इन दोनों को। उस निमाई पण्डित ने अच्छे-अच्छे लोगों का माथा बिगाड़ डाला है ,ऐसा कहकर अस्थिर हो उठते। कोई-कोई दुष्ट तो इन्हें चोरों का दूत ही कह कर इनकी आलोचना करने लगता, साधु घर में बैठकर भजन करते हैं या तुम्हारी तरह घर-घर जाकर दूसरों को भजन का उपदेश देते हैं, तुम तो अपनी महिमा प्रकाश करते डोल रहे हो ! फिर यहाँ आये तो थाने में बन्द कर दिए जाओगे ।”

     🌹सुन-सुनकर बातें श्रीनिताईचाँद-श्रीहरिदास हँसते थे-"क्या प्रभु ने आज हमें दुर्जन-सज्जनों की जाँच करने भेजा है? इन्हें भगवान् श्रीविश्वम्भर की आज्ञा की अवहेलना करने में डर नहीं लगता है ? श्रीनिताईचाँद एवं श्रीहरिदास अपने प्रभु श्रीगौरांग की आज्ञा का बल पाकर सब जगह निर्भय होकर विचरण करते थे। दिन में घर-घर जाकर प्रभु की आज्ञा का प्रकाश करते और सायंकाल में लौटकर श्रीगौरांग को सब वृत्तान्त कह सुनाते ।।

       🌹एक दिन उन्होंने देखा डाकुओं के समान दो मतवाले व्यक्तियों को, जो
मद्य के नशे में चूर हो रहे थे। इन दो प्रेम-मतवालों ने आज एक दूसरी किस्म के मतवाले देखे। आने-जाने वालों से इन्होंने उनका परिचय पूछा। जानकर अति दुःखी हुए कि कोई पाप ऐसा नहीं है जो ये दोनों न करते हों। हैं तो ब्राह्मण, परन्तु मद्य-मांस का भक्षण करते हैं। डाका-चोरी, परदारा-हरण इनका तो नित्य कर्म है।

       🌹श्रीनिताई चाँद एवं हरिदास ने देखा -कोई व्यक्ति इनके पास नहीं जाता है। दोनों मद्य के नशे में पथ से गिरे जा रहे हैं। आते-जाते लोगों से गाली -गलौच करते हैं।लीग इनका पथ छोड़कर दूसरे पथ से निकले जा रहे हैं।बहुत से लोग इनकी दुरवस्था को देख रहे थे, श्रीनिताईचाँद- हरिदास उनके साथ खड़े -खड़े इनकी दुर्दशा देखने लगे।

      🌹दोनों दुष्टों ने इन पर आक्रमण किया और ये उस दिन किसी प्रकार जान
बचाकर वापिस आये और सारा वृतांत प्रभु को कह सुनाया।

    🌹दो दिन बाद श्रीनिताई चाँद नगर भृमण करते हुए रात के समय जगाई -मधाई के घर की तरफ निकले। इन्हें देखते ही दोनों ने, कौन है रे, कौन है तू? बोलते हुए पकड़ लिया। श्रीनिताईचांद तो आज इनके उद्धार का संकल्प ही लेकर आए थे। अनजान से होकर बोले "श्रीनिमाई पण्डित के घर जाऊँगा, किधर रहते हैं वे ?"

"क्या नाम है तेरा ?” मधाई ने पूछा।

"मुझे नित्यानन्द अवधूत कहते हैं' श्रीनिताईचाँद बोले ।।

     🌹‘अवधूत' सुनते ही महा क्रोधित हो माधाई ने हाथ में शराब की सुराही पकड़ रखी थी, खैंचकर प्रभु के माथे पर दे मारी। सुराही तो टूटीं प्रभु श्रीनिताईचाँद का माथा भी फूट गया। रक्त की धारा बह निकली। ‘कृष्ण-गोविन्द नाम का उच्चारण करते हुए अक्रोधपरमानन्द श्रीनिताईचाँद वहाँ खड़े ही रहे,बोले-भैयाओ ! “कृष्ण बोलो” "हरि बोलो ।।

    🌹श्रीनिताईचाँद को रक्त में लथपथ देखकर जगाई के न जाने मन में कैसे आज दया उदित हो उठी, जीवन में यह पहली बार थी। माधाई तो और प्रहार करना चाहता था, जगाई ने दौड़कर उसके हाथ पकड़कर कहा-अरे इतनी निर्दयता से क्यों मार दिया तुमने। इस परदेशी को मारकर क्या लेगा तू ? हट इस संन्यासी को मत मार क्या लाभ होगा तुम्हें इसे मारके ?श्रीनिताईचाँद यही कहते खड़े रहे–भैयाओ ! एकबार हरि बालो। एक बार कृष्ण बोलो।।

   🌹आस-पास के लोग भागे-भागे श्रीविश्वम्भर के पास पहुँचे और सब बात कह सुनाई। सुनते ही श्रीविश्वम्भर भक्तों के साथ वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। रक्त में नहा रहे थे रक्तकमललोचन और ‘जगाई–माधाई के बीच खड़े मुस्करा रहे थे। भूल गए करुणावतार अपने को और महा क्रोधित होकर उनका हाथ ऊँचा उठा 'चक्र' 'चक्र' कह गर्जने लगे। चक्रसुदर्शन महातेज प्रसारण करता हुआ श्रीगौरांग के हाथ पर उनके आदेश का इन्तजार न कर पा रहा था, तुरन्त जगाई -मधाई के सिर का छेदन करना ही चाहता था।

क्रमशः

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