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क्रम: 3⃣9⃣

   *जगाई-मधाई उद्धार*

🌹अक्रोध -परमानन्द पतित-पावन श्रीनिताई चाँद ने देखा -सर्वनाश ! प्रभु ति इन दोनों का सँहार करना चाहते हैं। प्रभु तो प्रेम प्रदायन कर असुरों का उद्धार करने आये हैं न कि अस्त्र-शस्त्रों से उनका सँहार करने। यह अस्त्र-युग तो नहीं है।झट विशम्भर के चरणों मे गिर पड़े और निवेदन किया निताईचांद ने--

    करुणामय क्या कर रहे हैं आप !! मधाई ने नशे में मुझे मटकी मारी है।किंतु मुझे कोई कष्ट नहीं हैं। प्रभो ! आप स्थिर रहो, मुझे जगाई मधाई के शरीरों की भिक्षा दीजिए। माधाई अवश्य फिर मारना चाहता था, इस जगाई ने तो मुझे बचा लिया।

     🌹'जगाई ने बचा लिया’—यह वचन सुनते ही करुणामय श्रीविश्वम्भर कुछ शान्त हुए और आगे बढ़कर जगाई को गले लगा लिया और बोले-“जगाई !श्रीकृष्ण तुम पर कृपा करें । तुमने मेरे निताईचांद की रक्षा कर मुझ मोल ले लिया है। वर मांगो क्या चाहते हो तुम। आज से तुम्हें प्रेम भक्ति की प्राप्ति
हो ।”
  
    🌹करुणामय की असीम कृपा देख समस्त वैष्णव ‘जय जय ध्वनि कर चमत्कृत हो उठे। जगाई प्रेम भक्ति का वरदान पाते ही मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। श्रीगौरांग ने अपने हाथों से उठाकर कहा- ‘जगाई ! देख तो मेरी तरफ । मैंने निश्चय ही तुझ प्रेम-भक्ति का दान दिया-

*प्रभु बोले-जगाई उठिया देख मोरे ।।*
*सत्य आमि प्रेमभक्ति दान दिल तोरे ।।*

   🌹ज्यों ही जगाई ने आँख खोलकर देखा-श्रीगौरांग चतुर्भुजरूप में शंख,चक्र, गदा एवं पदम लिए सामने खड़े मुस्करा रहे थे। अदभुत तेज पुञ्ज से चारों दिशाएँ देदीप्यमान हो उठीं । जगाई अपने को सम्हाल न सका। मूर्च्छित हो पुनः पृथ्वी पर गिर पड़ा। श्रीविश्वम्भर ने अपना पावन चरण जगाई के वक्षस्थल पर रखा। आकाश में देवता जय-जयकार कर पुष्पों की वर्षा करने लगे। करुणामय के सुर-नर-मुनि-दुर्लभ चरण का स्पर्श पाते ही जगाई पुलकित हो उठा, पकड़ लिया प्रभु का पीताम्बर और उच्चस्वर से रोने लगा।

    🌹जगाई बोला-हे विश्वम्भर ! आपमें अनोखी बात कैसी ? जगाई–माधाई दो देह हैं पर जीव एक है। दोनों ने एक से अखण्ड पाप कमाए हैं, दोनों एक जगह रहते हैं। एक पर कृपा और एक की उपेक्षा-पतित-पावन यह कैसा पक्षपात ?

   🌹माधाई एक तरफ जड़वत् खड़ा था। देख-सुन रहा था यह सब। जगाई के बचन सुनते ही एक लहर सी उसके शरीर मे दौड़ गयी। काम्प उठे सब अंग उसके। नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगी। श्रीविशम्भर की ओर आगे बढ़ा और हाथ जोड़कर बोला-विशंभर ! मुझे छोड़ रहे हो , वंचित कर रहे हो मुझे। हम दोनों बराबर के भागीदार हैं। बराबर की ही पूँजी है हमारे पापों के पुंज की। हे पतित पावन !एक पर अनुग्रह और एक पर निग्रह। ऐसा क्यों दयामय? मेरा भी उद्धार करो, मुझे भी चरणों मे स्थान दो।

क्रमशः

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