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        क्रम :4⃣2⃣

        *माधाई-स्तुति*

🌹अब तो जगाई-माधाई नवद्वीप में परम वैष्णव होकर गंगा किनारे वास करने लगे।उषाकाल में प्रतिदिन गंगास्नान करते। दो लाख श्रीकृष्णनाम् ग्रहण करते। अपने को हर समय धिक्कार करते रहते और कृष्ण-कृष्ण कह निरंतर रोते ही रहते। पिछले हिंसात्मक कुकर्मों को याद कर कर मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर जाते एवं हे निताइचांद ! हे गौरचाँद !!  हे पतित पावन  पुकार पुकार कर जोर से क्रन्दन करते। कभी-कभी कई कई दिन अन्न-जल तक छोड़ देते और श्रीगौरांग आकर अपने हाथ से इन्हें भोजन कराते ।।

🌹माधाई की अवस्था तो और भी दयनीय थी। श्रीनिताईचाँद ने सब अपराध क्षमा कर दिये थे, परन्तु माधाई के दिल से, वह भयानक कृत्य,निर्दय-कर्म नहीं हटता था, जो शराब की सुराही मार कर उनका माथा फोड़ दिया था। इस बात को याद कर करके वह अपने माथे को पीटने और चिल्लाने लगता-हाय ! हाय !! मुझ दुष्ट ने तुम्हारा माथा फोड़ा।तुम्हारे अंगों में भगवान् चैतन्यचन्द्र का निवास है, हाय ! मेरे हाथों ने उस पर प्रहार कर डाला। हाय ! मेरे हाथ न जल गये, मेरा मस्तक न फूट गया। इस प्रकार रात-दिन चिल्ला-चिल्ला कर माधाई मूर्च्छित हो जाता और उसे आहार, देह सम्हार की भी चिन्ता न रहती।

🌹श्रीनिताईचाँद तो स्वच्छरूप से नवद्वीप में विहार कर ही रहे थे। एक दिन श्रीनिताईचाँद को अकेला देख माधाई मार्ग ही में उनके चरणों पर पड़ गया। चारु चरण नेत्र जल से धोये, मुंह से तृण लेकर श्रीनिताईचाँद की स्तुति करने लगा।

🌹अनेक स्तुति करते हुए माधाई मूछित होकर गिर पड़ा। प्रेम मूर्छा देख प्रेमदाता श्रीनिताईचाँद ने माधाई को झट उठाया और गले से लगा कहा-ओ माधाई । उठ उठ, देख तू तो मेरा दास हैं। तुम्हारे शरीर में तो मेरा प्रकाश है। छोटे बालक के मारने पर क्या कभी पिता उसका अपराध गिनता है, तुम्हारे प्रहार को तो उसी प्रकार मानता हूँ मैं। तुम तो अब मेरे निमाईचाँद के अनुग्रह पात्र बन गए हो, तुम्हारा तिलमात्र भी मेरे प्रति अपराध नहीं रहा। मेरी यह प्रतिज्ञा है-जो व्यक्ति चैतन्यदेव का भजन करता है, वह मुझे प्राणसम प्रिय है। युग-युग में उसकी रक्षा करता हूँ।

*ये जन चैतन्य भजे सेई मोर प्राण।*
*युगे युगे आमि तार करि परित्राण ।।*

    🌹इतना कहकर श्रीनिताईचाँद ने माधाई को पुनः आलिंगन किया और
उसकी सब चिन्ता दूर कर दी।

   माधाई ने कहा, प्रभो ! मेरा एक निवेदन है। आप सबके हृदय में वास करते हो। मैंने अनेक जीवों की हिंसा की है, उनके प्रति मेरा घोर अपराध है।वह कैसे दूर होगा ?
श्रीनिताईचाँद ने कहा- 'माधाई ! तुम नित्य गंगा के घाट को मार्जन किया करो। समस्त स्नान करने वालों को दण्डवत् प्रणाम करो, इस प्रकार गंगा का सेवन करने से तुम्हारी समस्त जीवों के प्रति अपराधबुद्धि बनी हुई है, दूर हो जाएगी।

🌹माधाई ने प्रभुपाद की प्रदक्षिणा की और कृष्ण-कृष्ण कहता हुआ गंगाघाट पर जाकर निवास करने लगा (आज तक वह घाट माघाई-घाट के नाम से विख्यात है।) माधाई के इस आचरण को देख-देख कर नदियावासी विस्मित हो उठे और प्रभु निताईचाँद की अपूर्व महिमा का गान करने लगे।

क्रमशः

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