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क्रम : 4⃣3⃣
*श्रीनिमाई के अन्तरंग*
🌹एक दिन श्रीमन महाप्रभु सुख से विराजमान थे, चारों ओर भक्त-पार्षद बैठे हुए थे। अचानक प्रभु बोले -"पीपल का सेवन किया था, कफ-निवारण के लिए, किंतु उल्टा फल हुआ-कफ की वृद्धि हो उठी"। यह कहकर प्रभु कहकहा मारकर हँसने लगे। यह सुनकर सबके सब वैष्णव विस्मित हो उठे। कोई भी इस वाक्य का अर्थ न समझ सका। परन्तु श्रीनिताईचाँद श्रीमन महाप्रभु के हृदय की बात को जान गए और समझ गए कि प्रभु शीघ्र घर का त्याग कर सन्यास धारण करना चाहते हैं। श्रीनिताई डूब गए दुख के सागर में।प्राण व्याकुल हो उठे। थोड़ी देर बाद प्रभु ने निताईचाँद का हाथ पकड़ा और एकान्त में जाकर बोले श्रीपाद ! अपने मन की बात कहता हूँ आपसे। मैंने जगत् का निस्तार करने के लिए अवतार धारण किया, किन्तु जगत् वासियों का बन्धन तो हटा नहीं, उलटा एक गाँठ पर दूसरी गाँठ लग गई। अनेक लोग मेरी निन्दा करने लगे हैं, मुझे मारने को भी उधत हो उठते हैं। इससे उनका मेरे प्रति घोर अपराध हो रहा है। उनका निस्तार कैसे होगा ? अतः मैं कल मस्तक मुंडाकर ग्रह का परित्याग कर भिक्षा करते हुए घर-घर डोलूंगा। मुझे संन्यासी–भिक्षु देखकर वे मेरे निन्दक, विरोधी लोग भी मुझे प्रणाम करेंगे जिससे उनके समस्त अपराध दूर हो जाएँगे। क्योंकि संन्यासी को देखकर हर एक व्यक्ति नमस्कार करता है। संन्यासी की कोई निन्दा भी नहीं करता। निताईचाँद !आप मन में कुछ दुःख नहीं मानना, मैंने तुम्हारे आगे सब मन की बात खोल कर रख दी है। यदि जगत् का उद्धार आप चाहते हैं तो प्रभुपाद ! मुझे मना नहीं करना संन्यास ग्रहण करने से ।।
🌹'हाय ! ये सुन्दर केश मैं कल नहीं देख पाऊँगा,-मन में आते ही श्रीनिताईचाँद व्याकुल हो उठे। हृदय फट गया। किन्तु जानते थे कि प्रभु का निश्चय दृढ़ है, उनके अवतार का हेतु ही है जगद्-उद्धार । नेत्रों में अश्रु भरकर बोले-करुणामय ! तुम्हारी इच्छा ही तुम्हारा निश्चय है। आप स्वतन्त्र हैं, परम स्वच्छन्द हैं। जगत् के उद्धार का उपाय आप ही जानते हैं। कोई इसमें निषेध क्या कर सकता है? परन्तु प्रभो ! यह बात सब भक्तों को कह देखिये, वे क्या कहते हैं।"
श्रीमन्महाप्रभु श्रीनिताईचाँद की वाणी से सन्तुष्ट होकर भक्तों के पास आए और श्रीमुकुन्द आदि भक्तों से अपने मन की बात कही। श्रीनिताईचाँद ले जब से प्रभु के संन्यास की बात सुनी, इनके प्राण छटपटाने लगे। कैसे धारण करूंगा इस शऱीर को, निभृत स्थान पर बैठ रोते रहते और निश्चय कर लिया कि प्रभु के साथ मुझे भी जाना है।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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