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क्रम : 4⃣4⃣
*श्रीगौरांग -नियामक*
🌹श्रीगौरांग सन्यास लेते ही प्रेमाविष्ट हो उठे और वृन्दावन की ओर चल पड़े। श्रीनिताई चाँद चन्द्रशेखर एवं श्रीमुकुंद ये तीनो प्रभु के पीछे चल पड़े। प्रेमोन्माद दशा में उन्हें दिशा-विदिशा का ज्ञान नहीं था और न ही रात-दिन का ही भान था। नृत्य तरंगों में महा उल्लास पूर्वक हुँकार ध्वनि करते हुए श्रीमहाप्रभु स्वेद ,स्तम्भ आदि सात्विक भाव से विभूषित हो । कभी भाग पडते तीव्र गति से और कभी जड़वत हो ही जाते।इस प्रकार तीन दिन तक राढ़ देश में भृमण करते रहे। निरन्तर तीन दिन तक,न कोई आहार नहीं, स्नान नहीं जल तक भी पान नहीं किया , श्रीनिताई चाँद व्याकुल हो उठे प्रभु की यह दशा देख कर स्वयं भी तीन दिन से भूखे, प्यासे थे परन्तु अति तीव्र गति से धावमान प्रभु के पीछे भागते-भागते अति आतुर हो उठे- मन ही मन प्रार्थना करने लगे, हे गौरांग कृपानिधि देखो, प्रभो ! कृपा करो, मेरी रक्षा करो। अब मैं अधिक आपकी इस अवस्था को सहन नहीं कर सकता।
🌹 श्रीनिताईचाँद ने देखा, श्रीगौराँग की यह आनन्द-विवशता हमारे जीवन की रक्षा का भी साधन हो सकती है-इन्हें पथ का ही जब विचार नहीं क्यों न मैं इन्हें श्रीअद्वैत के घर ले चलूँ और एकबार माताशची को इनसे मिलाऊँ। सत्य संकल्प श्रीनिताईचाँद ने देखा कुछ गोपगण गईया चरा रहे हैं-उन्होंने श्रीगौरांग को देखा और आनन्द में भर हरिबोल हरिबोल की ध्वनि करने लगे।
🌹इस 'हरिबोल की ध्वनि से श्रीमान्महाप्रभु को कुछ बाहर का ज्ञान हुआ।आनन्द-निद्रा से मानो जाग उठे। वे अवश्य कुछ देख रहे थे, सुन भी रहे थे,परन्तु क्या देख रहे थे, वे क्या सुन रहे थे—इसका उन्हें कुछ भी अर्थबोध न था। श्रीनिताईचाँद ने एक गोप कुमार को अपने निकट बुलाकर कहा- देखो यह संन्यासी वर तुमसे वृन्दावन का रास्ता पूछेगे। तुम इन्हें गंगा पथ से शान्तिपुर का रास्ता बता देना। तुम इन्हें ऐसा कहना कि वृन्दावन का यही रास्ता है।
🌹ऐसा ही हुआ। श्रीमन्महाप्रभु ने गोप बालकों से वृन्दावन का रास्ता पूछा और उन्होंने प्रभु को शान्तिपुर का रास्ता बता दिया। अब श्रीमन्महाप्रभु तो गंगा की तरफ अग्रसर हुए और श्रीनिताईचाँद ने श्रीचन्द्रशेखर को शान्तिपुर श्रीअद्वैताचार्य के घर भेज दिया यह कह कर कि आप अति शीघ्र बहिरवास कोपीन लेकर एक नौका का प्रबन्ध कर गंगा किनारे प्रभु के पास पहुंचिये । श्रीमनमहाप्रभु वृन्दावन आवेश में हा कृष्ण ! हा वृन्दावन ! उच्चारण करते हुए अर्धब्रह्यवस्था में आगे चले जा रहे थे। श्रीनिताई चाँद ने अपने प्राणों की रक्षा मानी और झट प्रभु के सामने आकर बोले-प्रभु ! अब आप वृन्दावन के निकट आ गए हैं।
श्रीगौरांग-(विस्मित होकर)आप कौन?श्रीपाद नित्यानन्द ?यहाँ कैसे ?
श्रीनिताई चाँद-प्रभो ! मैं भी आपके साथ वृन्दावन जाऊँगा।
श्रीगौरांग-ठीक, तो चलो एक साथ चलेंगे श्रीवृन्दावन । कितनी दूर है यहां से ?
श्रीनिताई चाँद-श्रीपाद !सामने ही कुछ दूरी पर श्रीयमुना पास रहा श्रीवृन्दावन।
🌹 उन्मत गति से चलते हुए प्रभुपाद गंगा के किनारे पहुँचे ।श्रीयमुना जानकर प्रभु ने सादर प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति करने लगे -
*चिदानन्दभानो सदानन्दसूनो परप्रेमात्री इदगात्री।*
*धान्ता लवित्री जगन्धात्री सावित्री क्रियान्नो पुत्रिपुत्री।।।*
🌹चिदानन्द-निवेश जिनकी अंग कान्ति है उन श्रीनन्दनन्दन की नित्य परम प्रेयसी है और जलरूप द्रव-ब्रह्म ही जिसका शरीर है, दर्शन मात्र से जो समस्त पापों को दूर करने वाली है जगत् का मंगल करने वाली
है तो सूर्य पुत्री श्रीयमुना जी हमारे शरीर को पवित्र करें।
🌹 फिर प्रभु स्नान के लिए उतरे, किन्तु श्रीनिताई किनारे पर ही खडे रहे ।प्रभु स्नान कर बाहर निकले अदभुत शोभा थी संन्यासी शिरोमणि की। भीगी कोपीन, भीगा बाहेवास ,जल की बून्दे टपक रही थी,मानो किसी सुमेरु से किसी स्त्रोत का जल टपक रहा हो आपने अपने दोनों हाथ जोड कर मस्तक पर धारण कर रखे थे ऐसा लगता था, मानो कोई मतवाला हाथी अपनी सूंड में लाल कमल लेकर सूर्य-उपासना कर रहा हो।
🌹श्रीनिताई भी बड़े धीरे-धीरे यमुना में उतरे और जान-बूझ कर देर लगा रहे थे। ये गंगा जल में कलोल कर रहे थे। इसलिए कि श्रीअद्वैत प्रभु नौका लेकर आ जावैं। इतने में ही कोई भक्तों के साथ नौका लेकर इस पार आ पहुंचे।प्रभु के सामने आकर प्रणाम किया ।श्रीमनमहाप्रभु के आश्चर्य की सीमा न रही। आचार्य आप यहाँ कैसे? आप को कैसे पता लगा कि मैं वृन्दावन में हूँ ।
श्रीअद्वैताचार्य-श्रीपाद !आप जहाँ रहें, वहीं श्रीवृन्दावन है। मेरे सौभाग्य से आप गंगा तट पर पधारे हैं और सामने रही इस दीन की कुटिया।
श्रीगौरांग ने नेत्र उठाकर श्रीनिताई चाँद की तरफ देखा, कैसी थी वह अवलोकन-छटा ?नित्यानन्द! तुमने मेरी प्रताड़ना की है क्या?श्रीनिताई चाँद -श्री गंगा में श्रीयमुना अधिष्ठित हैं कि नहीं यह आचार्य जानते हैं।
श्रीअद्वैताचार्य -प्रभो !श्रीपाद के वचन मिथ्या नहीं हैं। यहां गंगा यमुना मिलकर एक धारा में बहती हैं। पश्चिम में यमुना धारा है और पूर्व में गंगा धारा। आपने पश्चिम धारा में स्नान किया है जो यमुना ही है।
🌹श्रीगौरंग-आचार्य !मैं तो श्री निताई चाँद के हाथों बिका हुआ हूं, नियामक हैं यह मेरे। जहाँ चाहे ले जाएं। इतना कह श्रीअद्वैत ने प्रभु को नोका पर बैठाया और श्रीनिताई चाँद समस्त भक्तों के साथ आनन्द उल्लास के साथ शांतिपुर आ पहुंचे। जय हो श्रीअवधूत शिरोमणि की, बिछुड़े जनों को मिलाने वाले श्रीनिताई चाँद की जय हो।
क्रमशः
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