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क्रम : 4⃣5⃣

*श्रीअद्वैतग्रह-भोजन*

🌹श्रीअद्वैत आचार्य महाप्रभु के दर्शन कर फूले न समाये। उन्होंने श्रीगौरचन्द्र एवं श्रीनताईचाँद के चरण धोये । श्रीसीतादेवी ने पहले से ही अनेक व्यञ्जन-पाक तैयार कर रखे थे। श्रीआचार्य ने सब पदार्थों को श्रीकृष्ण के भोग के लिए सजाया। उन्होंने तीन जगह भोग को बाँट कर रखा। स्वर्ण-पात्रा में तो श्रीकृष्ण के लिए और केला के बड़े-बड़े पत्तों पर दो जगह पृथक-पृथक श्रीगौरांग एवं श्रीनिताईचाँद के लिए।अनन्त व्यञ्जन, पाक मिष्टान्न , सागादि थे। कौन गिनती कर सकता है उन पदार्थों की जिन्हें श्रीआचार्यपाद ने श्रीभगवान के लिए सजाया था।

🌹भोग के बाद श्रीआचार्य ने उस प्रसाद को प्रभु के सामने परोसा।।श्रीगौरांग ने सब सामग्री को देखकर कहा-“आचार्यपाद ! इतना भोजन मैं नहीं कर पाऊंगा और झूठन छोड़ना संन्यासी का धर्म नहीं है।'

🌹श्रीअद्वैताचार्य-नीलाचल में तो चौवन बार भोजन करते हैं आप (जगन्नाथ रूप से वह भी एक बार में सौ-सौ भाड़ अन्न खा जाते हैं, यह तो चार–पाँच ग्रास मात्र । मेरे सौभाग्य से आप आज मेरे घर पधारे हो, अधिक चतुराई मत करो मेरे सामने।।

🌹श्रीनिताईचाँद ने प्रभु की बात सुनी और बोले-तीन दिन के उपवास के बाद आज बड़ी इच्छा थी पेट भर कर भोजन की, परन्तु आज भी उपवास ही रहा। इस मुट्ठी भर अन्न से मेरा तो कुछ नहीं होगा।'

🌹श्रीअदैताचार्य–निताई ! तुम हो तैर्थिक संन्यासी, कभी फल-फूल कभी कंदमूल और कभी उपवासी रहते हो। मुझ गरीब ब्राह्मण के घर इसी एक मुट्ठी अन्न में ही संतोष कर लो  न।
  श्रीनिताई चाँद-निमंत्रण के समय तो आपने ऐसा नहीं कहा था।

श्रीअद्वैत ने व्यंग कसते हुए कहा-उदर पूर्ति के लिए तुम अवधूत फिरते हो ,मैं समझ गया, गरीब ब्राह्मणों को दण्ड देने के लिए तुमने संन्यास लिया है। दस-बीस मन चावल तुम्हारे लिए मैं कहाँ से लाऊँ ? एक आध मुट्ठी जो मौजूद है, उसे प्रेम से पाओ, परन्तु झूठन नहीं छोड़ना।।

🌹श्रीमन्महाप्रभु दोनों की बातें सुनकर हँस रहे थे इस प्रकार अनेक हास-परिहास करते हुए दोनों प्रभुपाद भोजन करने लगे और श्रीअद्वैत बार-बार व्यञ्जनों की परोसगारी करने लगे। श्रीमन्महाप्रभु तो बार-बार बस,बस करते जाते थे और श्रीअद्वैत जबरदस्ती व्यञ्जन डालते जाते परन्तु हमारे निताईचाँद कह रहे थे-'मेरा तो पेट जरा भी नहीं भरा।' इतना कहकर इन्होंने एक मुट्ठी झूठे चावल उठाकर सामने फेंके श्रीअद्वैत की ओर और बोले-‘यह लो अपना अन्न-भोजन, मैं तो कुछ नहीं खाऊँगा, कहीं और देखूंगा।

🌹श्रीअद्वैत को आकर लगे वे झूठे चावल और नाचने लगे वे प्रेमाविष्ट होकर-‘मैं आज परम पुनीत हो गया'–बार-बार ऐसा कह पुलकित हो उठे।फिर बोले-“तुम्हें निमन्त्रण देने का आज अच्छा फल पाया है मैंने। तुम्हारी कोई जाति-कुल नहीं। (श्रीभगवान् की क्या जाति-कुल) तू तो पागल
(स्वाभाविक कृष्ण–प्रेमोन्मत्त) है। हाय ! हाय !! मुझे भी अपना सा पागल करना चाहते हो ? ब्राह्मण के अंग में झूठा भात मारने में तुम्हें कोई भय नहीं है ?

🌹श्रीनिताईचाँद-आचार्य ! यह कृष्ण प्रसाद है, तुम इसे झूठा कहते हो,महान् अपराध किया है तुमने। सौ संन्यासियों का भोजन कराने से तुम्हारा यह अपराध खण्डन होगा।

🌹श्रीअद्वैत-भूल कर भी मैं फिर किसी संन्यासी को भोजन नहीं कराऊँगा।
संन्यासी ने तो मेरा समस्त-धर्म बिगाड़ डाला है। इस प्रकार निन्दा के ब्याज श्रीनिताईचाँद की स्तुति करते हुए हास-परिहास पूर्वक श्रीआचार्यपाद ने श्रीगौरांग-श्रीनिताईचाँद को आचमन कराया,लवंग-इलाइची, तुलसीमञ्जरी युक्त पान दिया। दोनों ने विश्राम किया और रात्रि में अपूर्व कृष्ण-कीर्तन कर शांतिपुर को कृतार्थ कर दिया।

क्रमशः

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