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क्रम:4⃣6⃣
*श्रीनवद्वीपगमन*
🌹शांतिपुर में दस दिन कीर्तनांन्द आस्वादन करने के बाद श्रीगौरांग ने श्रीनिताई चाँद से कहा -श्रीपाद ! आप शीघ्र नवद्वीप जाएं और शांतिपुर में आचार्य-ग्रह में अवस्थिति की सब को सूचना देवें।
🌹प्रभु की आज्ञा पाकर श्रीनिताई चाँद परम हर्षित होकर नवद्वीप की ओर रवाना हो पड़े। प्रेम रस में उन्मत थे, हुँकार कड़ते हुए सिंह की तरह नवद्वीप की राह पर अग्रसर हो रहे थे। कभी कदम्ब वृक्ष को देखकर उसके सहारे त्रिभंग होकर वेणु बजाने की ललितमुद्रा में खड़े रह जाते। कभी उच्च स्वर से कृष्ण-कृष्ण कह रोने ही लगते। कभी-कभी तो कटि वस्त्र को माथे पर बांध लेते। स्वानुभाव में अनन्त आवेश पूर्वक सर्प की तरह टेदी-मेढ़ी चाल चले जा रहे थे। गंगा में कूद कर आप दूसरे किनारे पहुंचे।
🌹सर्वप्रथम नवदीप में आप माता शची के भवन में ही पधारे। वहाँ प्राण गौर के वियोग में भूखी-प्यासी माताशची बेसुध पड़ी हैं। आज बारहवाँ दिन था। कृष्ण-शक्ति से श्वास अवश्य चल रहे थे। प्राण भी तो प्राणनिमाई के दर्शन को रुक रहे थे। कृष्ण-विरह कातरा माँ यशोदा की तरह विह्वल श्रीमाता शची। नेत्रों से अजस्र अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी।
🌹इतने में श्रीनिताईचाँद वहाँ आ पहुँचे और आते ही माता के चरणों में दण्डवत गिर पडे। चारों ओर बैठे स्त्री-पुरुषों का धीरज बांध टूट गया। रो उठे सबके सब जोर से। क्रन्दन-कोलाहल से समस्त अडोस-पड़ोस भाग कर भवन में आ जमा हुआ। भीड़ लग गई वहाँ। माता शची अर्धखुले नेत्रों से गौरप्रिय निताई को देखकर पछाड खाकर गिर पड़ी। श्रीनिताई ने माता को गोद में ले लिया और कहने लगे-माँ, देखो, धीरज धरो।प्राणनिमाई शान्तिपुर आ गए हैं,तुमको लिवाने आया हूँ मैं। अनेक बार बोलने पर मुंह पर जल छिडकने के बाद माँ ने नेत्र खोले। श्रीनिताई का आलिंगन कर मस्तक सूंघा, बोलना चाहती थीं किन्तु कण्ठ अवरुद्ध था, कुछ बोल न सकीं। माँ ! प्राण निमाई के पास चलो, वे शान्तिपुर में आ चुके हैं बार-बार कहने पर जब माता ने यह सुना तो नये सिरे से प्राणों में एक स्पन्दन आगया। शीतल जल के दो घूँट परवश मुख में देने पर माँ ने पूछा-निताई । निमाई कहाँ है?तुम मुझे मिलाओगे उससे?प्रभुपाद ने मधुर वाणी से अनेक आश्वासन दिए। समस्त भक्त हरि हरि बोल ध्वनि से रोमांचित हो उठे। प्रभु ने सबको कहा-आप सब चलिए शांतिपुर। मैं आपको लिवाने आया हूँ।
🌹शची मां ने बारह दिनों से अन्न जल ग्रहण नहीं किया वे और गौर-प्राण वल्लभा गौरगत जीवना श्रीबिष्णुप्रिया भी उसी दिन से बेसुध पड़ी हैं-जान कर श्रीनिताई चाँद अति व्याकुल हो उठे। हृदय पर पत्थर रखकर कुछ सम्भल कर बोले-माता! कृष्ण की लीला का रहस्य कौन जान सकता है? तुम स्वस्थ होवो। बिष्णुप्रिया के जीवन की रक्षा तुम्हारे बिना कौन करेगा?चिंता मत करो। अहो जिस सौभाग्य को तुमने प्राप्त किया है, कोई भी नहीं पा सकता। वेद दुर्लभ कृष्ण तुम्हारे पुत्र हुए हैं। माँ ! निमाई ने कितनी बार अपनी छाती ठोककर कहा है कि तुम्हारे स्वार्थ-परमार्थ का सब दायित्व मुझ पर है। फिर किस बात की चिंता करती हो।
क्रमशः
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