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क्रम : 4⃣7⃣

*नवद्वीप गमन*

    तुम शीघ्र उठो, कृष्ण के लिए रसोई बनाओ वे भी तुम्हारे पीछे बारह दिन से
से बैठे हैं और विष्णुप्रिया भला कैसे अन्न जल ग्रहण करेंगी ? तुम स्वयं प्रसाद ग्रहण करो, उनके प्राणों की रक्षा करो। माँ !तुममें ही शक्ति है यशोदा और कौशल्या की तरह पुत्र-वियोग सहन करने की। तभी तो आकर तुम्हारे पुत्र बने हैं। तुम रसोई बनाओ आज मैं भी सवेरे से भूखा हूँ। तुम्हारे हाथ की प्रसादी के लिए मेरा मन भी चञ्चल हो रहा है।

    जैसे-तैसे माता शची उठीं, श्रीविष्णुप्रिया को भी धीरज दिया। दोनों ने उठकर श्रीभगवान् के निमित्त भोजन तैयार किया। सबको माता शची ने प्रसाद खिलाकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण किया। रोती जा रही थीं गले में ग्रास अटकता जा रहा था। विष्णुप्रिया जी बार-बार पानी का घूँट देकर मां को आश्वस्त कर रही थी।

     श्रीनिताईचाँद के नवद्वीप आगमन की बात सारे नवद्वीप में बिजली की तरह दौड़ गई और सब गौरांग दर्शन के लिए आतुर हो उठे। नर-नारी,बाल-वृद्ध, युवक शचीमाता के दरवाजे पर आ–आकर एकत्र होने लगे। कोई भी अपने घर में रहने को तैयार न था। सबसे बड़ा आश्चर्य यह था कि जो श्रीनिमाई की अनेक प्रकार की निन्दा करते थे, वे भी घर-बार छोड़-छोड़ कर सब से आगे तैयार हो गये थे शान्तिपुर जाने के लिए।

      माता शची ने श्रीविष्णुप्रिया को बुलाया कि मेरा हाथ पकड़ कर तुम आगे-आगे चलो। सब लोग हरि हरि बोल ध्वनि कर पुलकित हो रहे थे।श्रीविष्णुप्रिया जी भी संकोच त्यागकर आज प्राण प्रीतम के दर्शन के लिए कितनी आतुर थीं, उसका कुछ अनुमान नहीं किया जा सकता। श्रीनिताई चाँद यह सब देख अति द्विविधा में पड़ गए। उनके कदम नहीं उठ रहे थे जड़वत् स्तबद्व होकर जमे हुए खड़े थे। सब आश्चर्य में थे श्रीनिताईचाँद क्यों खड़े हैं?क्या सोच रहे हैं ?

    श्रीनिताई चाँद ने आगे बढ़कर माँ शची के कान में कहा-माता !बिष्णुप्रिया नहीं जाएंगी।प्रभु ने सन्यास ग्रहण कर लिया है। उनकी इन्हें ले जाने की आज्ञा नहीं है।सुनते ही वज्रपात सा हुआ, मां शची मूर्छित होकर गिर पड़ीं भूमि पर। श्रीबिष्णुप्रिया ने माता को संभाला। मां शची ने कहा-अरे निताई !यदि विष्णुप्रिया नहीं जाएंगी तो मेरा वहाँ क्या काम ? मैं भी इसके साथ उस निष्ठुर चित्त निमाई की दर्शन अभिलाषा में अपने प्राणों की आहुति दे दूँगी। यह सब जानकर चारों ओर क्रन्दन कोलाहल मच गया। हाय ! हाय !! ऐसी निष्ठुरता !!!किशोरी बिष्णुप्रिया के लिए एक बार नेत्र भरकर दर्शन करने का भी सुयोग नहीं। हम क्यों जाने लगे। सभी के मन व्याकुल हो उठे।

  बिष्णुप्रिया जी ने संकोच छोड़ कर कहा माता ! मेरे दुर्भाग्य में आपका क्या भाग। आप जाइये, सब नदियावासी भी जाएँ। यदि प्राण प्रीतम की इसी में प्रसन्नता है तो मैं इसमें ही प्रसन्न हूँ। उन्हीं के सुख में मेरा सुख है। इस शरीर से न सही परन्तु मेरे प्राण वल्लभ मेरे हृदय से क्या विलग हो सकते हैं। आप जाइये प्रभु की आज्ञा हम सबके लिए सर्वतोभावेन पालनीय हैं। आप जाइये।'' इतना कहकर श्रीविषुप्रिया जी ने माता शची को प्रणाम किया और भवन के भीतर चली गई।

श्रीनिताईचाँद ने सबको शास्त्र वचनों से एवं प्रभु की गूढ लीला के सम्बन्ध में अनेक वचन कह कर आश्वस्त किया और माता शची को आगे कर शान्तिपुर की ओर चल पड़े। एक अनोखा हर्ष था, उल्लास था सभी के मन में। होना भी चाहिए था क्योंकि श्रीनिताईचाँद का अनुगमन कर श्रीगौरांग की प्राप्ति करने जा रहे थे। श्रीनिताईचाँद के आनुगत्य में परमानन्द की प्राप्ति, सर्व दुःखों की निवृत्ति, परम साध्य की प्राप्ति सुनिश्चित है ही।

   शान्तिपुर में जाकर सभी ने कुञ्चित केश विमण्डित मस्तक श्रीगौरांग को अब जब मुण्डित मस्तक देखा, सबका हृदय विदीर्ण हो गया।बिधाता को कोसने लगे हाय ! हाय ।। यह त्रिभुवन कोमलांग गौर किशोर क्या संन्यासी होने के योग्य थे। माता शची का मिलन वर्णन करते तो हृदय विदीर्ण होता है। श्रीगौरांग ने सबको आश्वासन दिया। रात्रि के समय श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु ने श्रीगौरांग के चारों ओर घूमकर आनन्दावेश में असंख्य भक्तों के साथ संकीर्तन महोत्सव मनाया। समस्त नवद्वीप एवं शान्तिपुर वासी श्रीनिताईचाँद की जय-जय ध्वनि कर कृतार्थ हो गये।

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