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क्रम : 4⃣8⃣

        *दंड भँग*

इस प्रकार शांतिपुर में माता शची एवम नवद्वीप वासी भक्तों से मिल कर श्रीमनमहाप्रभु माता की अनुमति लेकर जब नीलांचल की ओर चले तो उनके साथ श्रीनिताई चाँद श्रीदामोदर पण्डित, श्रीजगदानंद तथा श्रीमुकुंद भी कृष्ण-कीर्तन करते हुए पीछे हो लिए। सुवर्ण रेखा नदी पर पहुंच कर प्रभु ने स्नान किया और श्रीजगन्नाथ दर्शनावेश में वहां से अति तीव्र गति से चल दिये। श्रीनिताई चाँद तथा अन्य वैष्णव गण स्नान करते ही रह गए। श्रीचैतन्य तो श्रीजगन्नाथ दर्शनार्वेश में इन सबको भूल गए और श्रीनिताईचाँद तो श्रीचैतन्यावेश में हर समय भूले रहते ही थे। हर समय, हर अवस्था में वे विह्वल ही रहते थे। कभी हुँकार तो कभी क्रन्दन, कभी महा अट्टहास तो कभी गर्जन ।स्वर्णरेखा नदी की तरंगों में ही उछल कूद रहे थे।

   श्रीमन्महाप्रभु ने स्नान के समय अपना दण्ड श्रीनित्यानन्द प्रभु के हाथ में दिया था। देकर वे तो प्रेमावेश में आगे चले गए ,श्रीजगदानन्द भिक्षा के लिए इधर-उधर गए हुए थे। श्रीनिताईचाँद की दृष्टि अपने हाथ में लिए हुए दण्ड पर पड़ी और हँसकर कहने लगे-“अरे वाह रे दण्ड ! जिनको मैं हृदय में धारण करता हूँ। वे तुम को हाथ में धारण करते फिरें अति अनुचित बात है यह। बड़ा निर्दयी ,कठोर है तू। अब तो प्रभु ने भी तुझे भुला दिया है।जिसको प्रभु ने भुला दिया, वह निष्प्रयोजन है। प्रभु ने जिस प्रेमावेश में तुम्हें भुलाया है, वहाँ तुम्हारा प्रयोजन भी कुछ नहीं है। उस प्रेमावस्था के तो दैन्य और सौम्य दो ही आभूषण हैं, वहाँ दण्ड का क्या काम ? इतना कहकर श्रीनिताईचाँद ने उस दण्ड के तीन टुकड़े कर डाले और नदी में फेंक दिये। जिसे श्रीमन्महाप्रभु त्याग दें उसे भला श्रीनिताईचाँद कैसे अपने पास रखते ?

    लौकिक दृष्टि से संन्यासियों के लिए दण्ड धारण करने का एक तात्पर्य है । वह यह कि मायाबद्ध संसारी जीव इन्द्रिय-सुख के लिए हर समय लालायित रहता है। शरीर, मन एवं वाणी-ये तीनों ही इन्द्रियों के सुखभोग में सहायक हैं। मन में सुख-भोग की वासना उठती हैं, वाणी द्वारा उस सुख को प्रकाशित किया जाता है और शरीर द्वारा उसे भोगा जाता है। जो लोग संन्यास धारण करते हैं, उनके लिए इन्द्रिय-सुख की वासना उसका कथोपकथन एवं भोगादि, उनके संन्यास को मिट्टी में मिला देने वाले हैं। इसलिए इन्द्रिय-सुख भोग के सहायक देह, मन एवं वाणी का संयम उनके लिए अति आवश्यक है।और संन्यास की रक्षा के लिए अपरिहार्य भी। अतः इन तीनों का शासन करने के लिए, शासक के प्रतीक दंड को वे धारण करते हैं।और दंड के ऊपर के सिरे पर ही कपड़े से तीन दंड बना लेते हैं।

    श्रीमनमहाप्रभु तो सच्चिदानंद स्वयं भगवान हैं।माया उनका स्पर्श तक नहीं कर सकती। माया से उतपन्न होने वाली भोग वासनाओं से बचने के लिए सन्यास लेते हैं एवं मन, वाणी देह के शासन के लिए दंड को धारण करते हैं। श्रींमनमहाप्रभु ऐसे सन्यासी न थे, उनका सन्यास तो उनकी स्वरूपानुबन्धिनी एक लीला मात्र था। उनके लिए कैसी भोग-वासना और कैसा शासन और शासन के प्रतीक दंड का क्या प्रयोजन? इसलिए श्रीनिताई चाँद ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर नदी में बहा दिया।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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