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क्रम : 4⃣9⃣

          *दंड भँग*

     श्रीनिताईचाँद श्रीचैतन्यदेव के मन के भी तो ज्ञाता हैं। दोनों एक ही न तत्व हैं। जगत के जीवों को भक्ति का रहस्य बताने के लिए लिए दो रूपों में प्रकट हुए हैं। स्वरूपतः श्रीगौरचन्द्र हैं श्रीकृष्ण, और श्रीनिताईचाँद हैं श्रीबलराम,श्रीकृष्ण ही मूल भक्तावतार श्रीबलराम रूप से अनादिकाल से आत्म प्रकट किए हुए हैं। वही श्रीबलराम हैं कृपा सिन्धु भक्ति–दाता श्रीनिताईचाँद और श्रीबलराम हैं प्रेमदाता भक्तगत–प्राण श्रीनिताईचाँद । वरना श्रीमहाप्रभु के दण्ड को तोड़ने का साहस किसे हो सकता था ? श्रीजगदानन्द भिक्षा करके जब वापस आए तो देखा कि दण्ड तो टुकड़े-टुकड़े हुआ नदी में पड़ा है। विस्मित हो उठे-"प्रभुपाद ! किसने तोड़ा है प्रभु का यह दण्ड ?' श्रीजगदानन्द ने पूछा।

    जिनका दण्ड था उन्हीं ने तोड़ा है और तोड़ कौन सकता है ?' श्रीनिताईचाँद
ने कहा। श्रीजगदानन्द चुप हो गए अटपटा उत्तर सुनकर-किन्तु नदी से फिर से तीनों टुकड़े श्रीजगदानन्द निकाल लाए और उठाकर साथ ले चले।

   श्रीमन्महाप्रभु एक वृक्ष की छाया के नीचे बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे श्रीनिताईचाँद की।

    श्रीजगदानन्द के हाथ में टूटा हुआ दण्ड देखकर प्रभु बोले-अरे ! किसने तोड़ा यह दण्ड, क्यों तोड़ा ?

   श्रीजगदानन्द ने सब हाल कह सुनाया। प्रभु ने श्रीनिताईचाँद की ओर देखा और बोले-'श्रीपाद ! आपने क्यों तोड़ डाला मेरा दण्ड ?' श्रीनित्यानन्द बोले-'हाँ, दण्ड मैंने तोड़ा है, मुझे दण्ड दीजिए, इस बांस के तोड़ने पर यदि आप क्षमा नहीं कर सकते हैं।

श्रीगौरांग-'अच्छा, तुम्हारे लिए यह एक बांस का टुकड़ा था, इसमें तो सर्वदेवताओं का अधिष्ठान माना जाता है।

   मन में कुछ और मुँह में कुछ और-यह तो लीलाधारी की लीला है, कौन समझ सकता है उनकी लीलागति को। स्वयम छोड़ आये दंड को और प्रेरणा की निताई चाँद के हृदय में। उन्होंने तोड़ डाला। अब कुछ क्रोध जताते हुए बोले-

*प्रभु बोले-सबे दंड मात्र छिल सँग*
*ताहो आजि कृष्णेर इच्छाते हैल भँग*

एक यही दण्ड तो मेरा संगी था, सब कुछ तो मैंने त्याग दिया था आज ही श्रीकृष्ण इच्छा से टूट गया। अब मेरे साथ कोई नहीं चलेगा, मैं किसी का संग नहीं करूंगा। देखो, तुम लोग या तो आगे चलो या पीछे-मेरे साथ
कोई नहीं चलेगा।

     सुनकर सब सहम गए और चिन्ता में पड़ गए।चिन्ता यही कि इनको अकेला कैसे छोड़ा जाय। श्रीनिताई मुस्करा गए और श्रीमुकुन्द जान गए प्रभु की मुख-वाणी से कि 'कृष्ण-इच्छा से ही दण्ड भंग हो गया वास्तव में तो तोडने की प्रेरणा देने वाले श्रीकृष्ण भी तो स्वयं ही हैं। श्रीमुकुन्द बोले-“ठीक है प्रभो ! आप आगे चलिए। हमें भी पीछे कुछ काम बाकी है।

     श्रीमन्महाप्रभु आगे चल दिये। जलेश्वर में शिव मन्दिर में प्रभु पहुँचे और शिवभक्तों ने प्रभु के दर्शन किये, मानो साक्षात् श्रीशिव ही पधारे हों। नाच उठे ,कृष्ण कीर्तन करते हुए भूल गए सब बात प्रभु। कुछ सुध नहीं और अनेक समय तक वहाँ रुक गए। पीछे से निताइचाँद, मुकुन्द, जगदानन्द भी आ मिले। इनको देखते ही प्रभु तो और भी प्रेमोन्मत्त हो उठे। सबको आलिंगन करने लगे। जेठ भरली श्रीनिताईचाँद की श्रीमन्महाप्रभु ने और बोले-निताईचाँद !मेरे संन्यास की रक्षा अब तुम्हारे हाथ में है जैसे चाहो, वैसे करो, तुम मुझे और भी अधिक पागल-प्रेमोन्मत्त करना चाहते हो।”

   सब भक्तों की ओर देखकर प्रभु बोले-"श्रीनिताईचाँद के प्रति सब सावधान रहिये। यह मेरा दूसरा विग्रह है। मेरे देह से भी इनका देह मुझे अधिक प्रिय है।।

*नित्यानन्दे याहार तिलक द्वेष रहे।*
*भक्त हइलेओ से आमार प्रिय नहे।।*

   जिसका श्रीनिताईचाँद के प्रति तिल मात्र भी द्वेष भाव है, वह कैसा भी भक्त क्यों न हों, मुझे वह प्रिय नहीं है।

   श्रीनिताईचाँद मुख नीचे किये खड़े रहे, लज्जावश, कैसी अद्भुत छबि थी श्रीनिताईचाँद की उस समय, उनके भक्तजन ही अनुभव कर सकते हैं।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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