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क्रम : 5⃣0⃣
*सार्वभौम-मिलन, जगन्नाथ दर्शन*
श्रीगौरांग ने अति तीव्रगति से प्रेमावेश में भाग कर अकेले जाकर श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन किये। वे उन्मत्त हो उठे और हुँकार करने लगे। वे चाहते थे कि दौड़ कर श्रीजगन्नाथ जी को उठाकर अंक में भर लूँ। किंतु मूर्छित होकर गिर पड़े। दर्शनार्थियों ने जल के छींटे, पंखा आदि अनेक उपचार किये की ये एक परदेशी सन्यासी चेतन हो उठे, परन्तु उनकी आनन्द मूर्छा साधारण न थी। सार्वभौम जो उस समय के एक अद्वितीय विद्वान थे, श्रीशंकराचार्य मायावाद के अपूर्व पण्डित एवं निष्ठावान थे, श्रीगौराँग की ऐसी दशा देख चमत्कृत हो उठे। यह कैसा पुरुष-रत्न? यह कैसा अपार ज्योतिर्मय सन्यासी !! उन्हें अनेक सेवकों द्वारा उठवा कर अपने घर में आये। इतने में निताईचाँद आदि अन्य संगी भी आ पहुँचे। उन्होंने महाप्रभु के बारे में सब बात सुनी। तब श्रीगोपनाचार्य जी श्रीमुकुन्द के पूर्व परिचित थे, उनके साथ सब सार्वभौम के घर आए। (च० चरितामृत द्रष्टव्य) उस समय निताईचाँद के दर्शन कर सार्वभौम परमहर्षित हुए एवं उनको नमस्कार किया। उनकी दिव्य आकृति, अवधूत अवस्था एवं कृष्ण–प्रेमावेश देखकर सार्वभौम रह न सके।जिनकी कीर्ति समस्त वेद गान करते हैं उन भगवान को अनायास अपने घर में आया देखकर श्रीसार्वभौम ने श्रीनिताईचाँद के चरणों की धूल उठाकर अपने मस्तक पर लगाई। और उन्होंने अपने पुत्र चन्द्रशेखर को साथ भेजकर सब भक्तों सहित श्रीनिताईचाँद को श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन के लिए भेजा।
श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन कर श्रीनिताईचाँद भावादिष्ट हो उठे।श्रीजगन्नाथ जी को ही आलिंगन करने के लिए मन्दिर के अन्दर घुस गए। द्वारपाल कोई रोक ही न पाया। श्रीनिताईचाँद स्वर्ण सिंहासन पर ही चढ़ गए और श्रीबलराम जी को आलिंगन करने लगे। पुजारी ने आगे बढ़कर ज्यों ही श्रीनिताईचाँद का हाथ पकड़ा, छूते ही पाँच–सात हाथ पीछे जा गिरा। श्रीनिताईचाँद ने श्रीबलराम जी के गले की माला उतारी और अपने गले में डाल ली। माला पहन कर आप बाहर निकल आए—मतवाले हाथी की सी चाल थी आपकी, पुजारी सब देखते ही रह गए और परस्पर कहने लगे-इस अवधूत में इतना बल कहाँ से आया? यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। हमारे रहते हुए मन्दिर में घुस कर श्रीबलराम को छूने की शक्ति का किसी मनुष्य में हो सकती है हाय हाय, मुझे तृण की तरह इस
अवधूत ने उठाकर फेंक दिया, उनमें से एक परिछा ने कहा। सबने श्रीनिताईचाँद के चरणों में प्रणाम किया। तब वे सब जान गए कि इतना तो सहज बाल्य भाव ही है, श्रीबलराम हैं।
दर्शन करने के बाद श्रीनिताई चाँद सब भक्तों के साथ श्रीसार्वभौम के निवास स्थान पर लौट आये जहाँ श्रीगौरांग अभी अचेत अवस्था मे शयन कर रहे थे। सबने मिल कर उच्चध्वनि से वहाँ श्रीकृष्ण संकीर्तन किया और प्रभु को सुधि आई। श्रीसार्वभौम ने सबके लिए श्रीजगन्नाथ जी के प्रसाद की व्यवस्था की।
क्रमशः
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