51

क्रम : 5⃣1⃣

        *गौड़देश-गमन*

      श्रीनिताईचाँद श्रीमन्महाप्रभू के साथ आनन्द पूर्वक नीलाचल वास कर रहे थे दे तो परम उद्दाम हैं। कोई स्थान ऐसा नहीं था, जहाँ वे स्वच्छन्द रूप से विलास न करते हों। निरन्तर परमानन्द रस में उन्मत्त रहते थे। बहुत थोडे लोग ही इनके स्वरूप तत्व को जान पाते थे। सदा ही ये श्रीकृष्णाचैतन्य नाम का जप, संकीर्तन करते रहते। श्रीलक्ष्मण जी की गति मति जैसे श्रीराघवेन्द्र में निरन्तर रहती थी, उसी प्रकार श्रीनिताईचाँद की गति–मति अविच्छिन्न रूप से श्रीगौरांगसुन्दर में ही केन्द्रित रहती थी।

       एकदिन श्रीनिताईचाँद एकान्त स्थान पर श्रीगौरसुन्दर के साथ बैठे हुए थे। श्रीगौरसुन्दर बोले- प्रभुपाद !अब आप शीघ्र ही नवद्वीप पधारो। आप जानते हो मैने प्रतिज्ञा की थी कि मूर्ख, अधम, दरिद्र, शूद्र आदि समस्त जगत् को प्रेम-सुखसागर में डुबा दूंगा। अब आप यदि इस प्रकार मुनि-धर्म को अपनाये रहोगे, अवधूत बने रहोगे, तो संसार के पतित जीवों का उद्धार कैसे होगा? और कौन करेगा? अतः अब आप इस उद्दाम भाव को छोड़िये । निताईचाँद ! भक्ति-रस-दाता तो आप ही हैं। आप यदि चुप साधे रहोगे तो हमारे आपके अवतार का क्या प्रयोजन ? अतएव भ्राता ! आप यदि मेरे वचनों को सत्य करना चाहते हो तो जल्दी ही गौड़देश पधारो और जितने भी मूर्ख, नीच, पतित जीव हैं उन सबको भक्ति प्रदान कर उनका संसार बन्धन दूर करो।

     श्रीगौरसुन्दर के आदेश-वचन सुनकर तत्काल ही श्रीनिताईचाँद अपने परिकर जनों को साथ लेकर गौड़देश की तरफ चल दिये।श्रीनिताईचाँद के साथ थे-रामदास, गदाधरदास, वैद्य रघुनाथ उपाध्याय, कृष्णदास, परमेश्वरदास, पुरन्दर पण्डित और भी इनके समस्त आप्तगण इनके साथ गौड़ देश को चल दिये। मार्ग में गमन करते समय श्रीनिताईचाँद ने सबको ही प्रेममय कर दिया। उन सबको आत्म-स्मृति तक न रही। उनके शरीरों में विविध सात्विक विकार हो उठे और वे प्रेमोन्मत्त हो उठे।

   श्रीरामदास श्रीनिताई चाँद के परिजनों में अग्रगण्य थे। वे तो गोपाल भाव मे आविष्ट हो उठे और मार्ग में ललित-त्रिभंग होकर वँशी बजाने की मुद्रा में तीन प्रहर तक खड़े रहे। श्रीगदाधर राधाभाव में आविष्ट हो - कोई दही ले लो री दही, कह कह कर पुकारने लगे। श्रीरघुनाथ उपाध्याय तो मूर्तिमती रेवती-बलराम कान्ता के ही प्रतीत होने लगे।श्रीकृष्णदास एवं परमेश्वरदास दोनों गोपबालक भावाविष्ट होकर वन में इधर-उधर हियो हियो करते हुए गौओं को घेरने लगे। पुरन्दर पण्डित तो बाली-पुत्र अंगद के भाव में आविष्ट हो उठे और वृक्ष पर चढ़-चढ़ कर कूदने लगे। इस प्रकार श्रीनिताईचाँद तथा उनके पार्षद जन अनेक भावों में आविष्ट हो उठे और अपने को भूल से गये।दाये की बजाय बायें ही अनेक दूर चले जाते। आगे जाकर पीछ लौट आता।उन्हें पता ही न लगता कि किधर जाना है और किधर जा रहे हैं। कभी सुध आती तो लोगों से पूछने पर पता लगता कि वे रास्ता भूले जा रहे हैं फिर पीछे लौट आते। थोड़ी दूर तक नहीं दस-दस कोस गलत रास्ते पर चले जाते ।जैसे उन्मत्त श्रीनिताईचाँद वैसे ही थे मतवाले इनके पार्षद गण। रास्ते की क्या चले, अपने शरीर, खान-पान की भी उन्हें सुध न थी। वे परम तृप्त हो रहे थे अत्यानन्द सुख में–नित्यानन्द में।

     इस प्रकार अनन्त धाम श्रीनिताईचाँद गंगा-तीर स्थित पानीहाटी ग्राम में आ पहुंचे। वहाँ श्रीराघव पण्डित के घर सब पार्षदों को लेकर निवास किया।यह श्रीराघव पण्डित वह हैं, जिनके नाम से झाली प्रसिद्ध है। इनकी बहन दमयन्ती श्रीगौरांग की प्रिय दासी थी और बारह मास के लिए प्रभु के लिए खाद्य-द्रव्य सुरक्षित रखती थी और जिस समय गौड़देशवासी रथयात्रा के अवसर पर नीलाचल जाते, तो श्रीराघव पण्डित के हाथ वे सब द्रव्य प्रभु के लिए भेजती। परम स्नेह से श्रीमहाप्रभु उस झाली में से उन द्रव्यों का वर्ष भर आस्वादन करते थे अपने सेवक गोविन्द के द्वारा। श्रीराघव पण्डित सपरिकर श्रीनिताईचाँद के दर्शन कर अति हर्षित हो उठे और प्रभु की अनेक प्रकार की सेवाविधान करने लगे। प्रभु निरन्तर परम-आनन्द में हुँकार करते और चैतन्य-प्रेम विह्वल रहते। शरीर की सुधबुध न रहती। एक दिन माधव, गोविन्द एवं वासुदेव तीनों मिल बैठे और अद्भुत गान करने लगे, फिर क्या था ? श्रीनिताईचाँद उद्दाम नृत्य करने लगे।अवधूत-शिरोमणि के चरणों की पटक से समस्त पृथ्वी टल-मल करने लगी।

क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

99

27

89