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क्रम : 5⃣2⃣
*गौड़देश गमन*
निरन्तर हरि हरि बोलते हुए नृत्य पूर्वक प्रभु जिसकी ओर दृष्टि करते, वही प्रेमावेश में धड़ाम से पृथ्वी पर पछाड़ खाकर गिर पड़ता। आज परमप्रेम रसमय श्रीनिताई चाँद संसार के उद्धार करने का श्रीगणेश ही मना रहे थे, क्यों न ऐसी दशा होती उसकी ? जिसकी तरफ आप आँख उठाकर देखते , उस व्यक्ति के शरीर मे अश्रु, पुलक, कम्पादि समस्त प्रेम के विकार प्रकाशित हो उठते। नाच उठता वह भाग्यवान भी हरिबोल -हरिबोल करते हुए।
इतने में श्रीनिताई चाँद नृत्य करते -करते एक सिंहासन पर चढ़ गए और बोले-मेरा अभिषेक करो। श्रीराघव पण्डित तथा समस्त पार्षदजन प्रभु का अभिषेक करने लगे। दो-चार नहीं सैंकड़ों घड़े गंगा जल के भर भर सब लाने लगे सुंदर सुगन्ध, चंदन, कपूर देकर श्रीनिताई चाँद के मस्तक पर डालने लगे। चारों और हरि-हरि ध्वनि होने लगी। कोई अभिषेक मन्त्र पढ़ने लगा। कोई गान करने लगा। सबके सब परमानन्द में निमग्न हो उठे अभिषेक के बाद नवीन वस्त्रों से श्रीनिताईचाँद को विभूषित किया भक्तों ने। श्रीअंगों में चंदन का लेप, गले में दिव्य वनभाला एवं तुलसी माला देकर अपनी भावना के अनुसार सबने श्रीप्रभु का सुन्दर श्रृंगार किया। कैसी अदभुत छवि थी जब उन्हें एक स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर दिया गया और श्रीधर पण्डित हाथ में छत्र लेकर पीछे खड़े हो गये। जय जय ध्वनि से आकाश पाताल गूंज उठा। त्राहिमाम्-रक्षमाम्' कह कह कर सब भक्त अश्रुपूर्ण नेत्रों से हाथ जोडकर चारों ओर खड़े हो गए।
प्रभु नित्यानन्द राय स्वानुभावानन्द में प्रेम दृष्टि की दृष्टि कर रहे थे चारों ओर। अचानक बोल उठे राघव ! शीघ्र कदम्ब पुष्प की माला गंथ कर लाओ। मुझे कदम्ब पुष्प अति प्रिय है, मेरा तो निवास है कदम्ब वन में।श्रीराघव ने मन में सोचा, आजकल कदम्ब पुष्प कहाँ ? अभी तो फुटने की ऋतु ही नहीं आई। श्रीनिताईचाँद बोले-‘सोच क्या रहे हो ? आंगन में देखो तो सही,ज्योंहि राघव पण्डित अपने आंगन में गए तो क्या देखा, नीबू और जामुन के वृक्षों पर कदम्ब के फूल फूट निकले थे। कैसा अपूर्व रंग और कैसी अपूर्व सुगन्ध । चमत्कृत हो उठे श्रीराघव पण्डित । एक क्षण के लिए सुध न रही तन-मन की। उन्होंने अपने को सम्हाला और पुष्पचयन कर एक विशाल माला को गूँथ कर ले आये और प्रभु के गले में डाल दी। परम सन्तुष्ट हो उठे श्रीनिताईचाँद, दिव्य गन्ध से समस्त भवन सुवासित हो उठा। सबके सब चमत्कृत हो गए। इस समय कदम्ब पुष्प कहाँ से आ गये । अचिन्त्य लीला है श्रीनिताईचाँद की। श्रीप्रभु ने वैष्णवगण से पूछा-बोलो तो, कैसी सुगन्ध का आप अनुभव कर रहे हो ? सबने कहा-प्रभो ! हमें तो दमनक पुष्प की सी सुगन्ध का अनुभव हो रहा है (दमनक पुष्प के वृक्ष, श्रीजगन्नाथ वल्लभ-उद्यान में अनेक थे अब भी मौजूद हैं)।
श्रीनिताईचाँद ने कहा-“देखो, आज आपके कृष्ण-कीर्तन में श्रीगौरांग सुंदर ही पधारे थे और सामने के वृक्ष के नीचे खड़े होकर आपका गान सुनते रहे हैं। उनके श्रीअंग में दमनक पुष्प की दिव्य माला थी, जिसकी सुगन्ध का आप अभी तक अनुभव कर रहे हैं।आपके कृष्ण कीर्तन को सुनने के लिए श्रीगौरांग नीलांचल से यहां पधारे हैं-मेरी बात में दृढ़ विश्वास करो। अब आप निरंतर श्रीकृष्ण का नाम कीर्तन करें।इतना कहकर सबके सब प्रकार की अद्भुत शक्ति संचार कर दी थी श्रीनिताई चाँद ने श्रीगदाधर ने। श्रीनिताई चाँद ने स्वयम तो प्राणी मात्र से हरि -हरि बुलवाया ही उन्होंने अपने पर्रिकर वृन्द में भी प्रेम प्रदायिनी शक्ति का संचार कर दिया था जिससे वे निर्भय होकर विचरने लगे और अपामर यवनों से भी हरिनाम ग्रहण करवाया। ब्रजवासियों के शुद्ध प्रेम को श्रीनिताई चाँद ने अपने प्रिय जनों को सहज में प्रदायन किया।
क्रमशः
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