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    क्रम : 5⃣3⃣

        *गौड़देश गमन*

     कुछ दिनों के बाद जब श्रीनिताईचाँद की इच्छा माता शची के दर्शन करने की जागी, तो आप वहाँ से परिजनों को साथ लेकर नवद्वीप की ओर चल दिये। सर्वप्रथम खड़दहग्राम में आए (जो चौबीस परगना जिलान्तर्ग गंगा के किनारे अवस्थित है) वहाँ पुरन्दर पण्डित के मन्दिर में श्रीनिताईचाँद ने अदभुत नृत्य किया। श्रीप्रभु की शक्ति का सञ्चार पाकर पुरन्दर मिश्र भावाविष्ट हो उठे। कभी तो वृक्षों पर चढ़ जाते। कभी वन में जाकर व्याघ्र की पीठ पर चढ़ बैठते । महा अजगर सर्प को ही हाथ में लेकर खिलाने लगे-ऐसी अद्भुत कृपा शक्ति का सञ्चार किया श्रीनिताईचाँद ने उनमें ।

     कुछ दिन वहाँ रहकर प्रभुपाद सपरिकर सप्तग्राम में आए। जहाँ सप्त ऋषियों का त्रिवेणी घाट पर तप–स्थान है। श्रीनिताईचाँद ने उस घाट पर स्नान किया और द्वादश गोपालों में एक गोपाल श्रीउद्धरणदत्त के भवन में आपने निवास किया। वह मन-वाणी-शरीर से श्रीनिताई-चरण का उपासक था। यही उसकी एकान्त प्रार्थना थी कि जन्म-जन्म मेरे प्रभु श्रीनित्यानन्द राम हों और मैं उनका चरण-किंकर। यह उद्धारणदत्त ठाकुर श्रीश्रीधरचन्द्र दत्त तथा श्रीमती भद्रावती के सुपुत्र थे। श्रीकृष्णावतार में श्रीकृष्ण के प्रिय सखा सुबाहुगोपाल थे। इन्होंने युवावस्था में ही अपने पुत्र श्रीनिवासचन्द्र को श्रीठाकुर सेवा एवं गार्हस्थ्य का भार सौंप कर वैराग्य ग्रहण किया और श्रीनिताईचाँद की एकान्त शरण ग्रहण कर उनकी मानसिक सेवा करते-करते
समस्त तीर्थो में पर्यटन किया। उद्धारणदत्त के वंश में जितने भी वणिक हुए, सबने घर घर जाकर श्रीनिताई चाँद का कीर्तन विहार किया। विष्णु-द्रोही लोग भी प्रभु की शरण मे आकर कृष्ण कीर्तन करने लगे। यहां के यवन लोग कृष्ण कीर्तन देखते ही नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहाने लगे। ब्राह्मण गण यवनों में ऐसे प्रेम विकार देख अपने ब्राह्मण जन्म को धिक्कारने लगे।

    कुछ दिन सप्तग्राम में रहने के बाद श्रीनिताई चाँद प्रभु शांतिपुर में पधारे। जहाँ श्रीअद्वैताचार्य प्रभु का निवास स्थान है।आचार्यपाद श्रीनित्यानन्द-राम के दर्शन कर कृतार्थ हो उठे उन्होंने श्रीनिताई चाँद की परिक्रमा की एवं उन्हें दण्डवत प्रणाम किया। प्रभुपाद ने श्रीआचार्यपाद को आलिंगन कर प्रेमाश्रु से अभिषिक्त कर दिया। दोनों अनेक देर तक एक दूसरे को आलिंगन किये हुए एक अद्भुत रस में लीन हो गए। दोनों एक दूसरे के चरण स्पर्श करना चाहते थे। बहुत देर बाद दोनों स्थिर हुए और श्रीअद्वैताचार्य श्रीनिताई चाँद की स्तुति इस प्रकार करने लगे--

• *श्रीनिताईचाँद स्तुति* •

*तुम्हीं नित्यानन्द-मूर्ति नित्यानन्द नाम ।*
*मूर्तिमन्त तुम्हीं चैतन्य-गुण-ग्राम ।।*
*तुम्ही सर्वजीव परित्राण महा हेतु।।*
*महा प्रलय में तुम्हीं सत्य-धर्म सेतु ।।*
*तुम्हीं जानों श्रीचैतन्य प्रेम-भक्ति ।*
*तुम्हीं धरो चैतन्य पूर्ण-शक्ति ।।*
*ब्रह्मा-शिव नारदादि जेते भक्तगन ।*
*सब के उपदेष्टा तुम परम पावन ।।*
*सबहिं करहु तुम विष्णु-भक्ति दान।*
*तथापि स्पर्शे नहीं तुम्हें अभिमान ।।*
*दोष दृष्टि रहित तुम पतित-पावन ।*
*तोम्हार तत्त्व जाने सोई जेई शुद्ध मन ।।*
*सर्वज्ञ श्रीविग्रह तुम्हार आनन्द–घन।।*
*स्मरण ते दूर होय अविद्या बन्धन ।।*
*अक्रोध परमानन्द प्रभु तुम महेश्वर ।*
*सहस्र मुख आदि देव अनन्त महीधर ।।*
*अधम पतित नीच करेन उद्धार ।*
*नित्यानन्द-राम तुम्हार यह अवतार ।।*
*जो भक्ति वाञ्छे योगेश्वर मन-मन ।*
*अनायास पावे सोई भक्ति सर्वजन ।।।*

     इस प्रकार अनेक स्तुति करते-करते श्रीअद्वैताचार्य तो आनन्दावेश मेंअपने को भूल गए। श्रीनिताईचाँद की वास्तव महिमा के एकमात्र ज्ञाता हैं। अद्वैताचार्य  प्रतिदिन परस्पर श्रीकृष्ण-कथा के मंगल प्रसंग में दोनों प्रभुपाद विह्वल हो उठे। कुछ दिन बाद श्रीआचार्यपाद से आज्ञा लेकर श्रीनिताईचाँद
नवद्वीप की तरफ रवाना हुए।

क्रमशः

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