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क्रम : 5⃣4⃣

*शची-मिलन एवं दस्यु-उद्धार*

     नवद्वीप में सर्वप्रथम आप शची माता के निवास स्थान पर आए ।उनके चरणों में प्रणाम किया। श्रीनिताईचाँद को देखकर माता शची के आनन्द की सीमा नहीं रही। उसे कौन वर्णन कर सकता है। शची बोली-तुम तो सचमुच अन्तर्यामी हो। मैं तुम्हारें देखने की अभिलाषा ही कर रही थी।मेरे चित्त में यह बात कल ही आई और तुम आज ही आ गए। निताई तुम्हारे स्वरूप को संसार में कोई नहीं जान सकता।' देखो, वत्स ! अब तुम कुछ यहाँ नवद्वीप में रहो, मुझ दुखिया की यही इच्छा है।।

       श्रीशची माता की बात सुनकर श्रीनिताईचाँद मुसकराकर बोले जगत-जननि ! मेरे मन में भी आपके दर्शन की बड़ी अभिलाषा थी। मेरे मन में भी यही आता है कि यहाँ आपके पास रहकर कुछ दिन आपकी सेवा सौभाग्य प्राप्त करूँ।।

    इस प्रकार माता शची को सन्तुष्ट कर श्रीनिताईचाँद नवद्वीप में आनन्दपूर्वक विहार करने लगे। घर-घर में सपार्षद संकीर्तन कर नवद्वीप वासियों को आनन्द-विभोर करने लगे। स्वर्णमणि-जड़ित अनन्त अलंकारों से विभूषित
विग्रह की अनिर्वचनीय शोभा देखकर सबका मन सहज ही आकृष्ट हो उठता था। परम मधुर नूपुरों की ध्वनि चरणों में, मस्त हाथी की सी चाल, वेत्र-वंशी एवं छड़ी को कमर–पट में खुर्से हुए मानों कृष्ण-रस ही मूर्त्तिमान होकर
गली-गली में घूम रहा था नवद्वीपवासी समस्त अधमों का प्रभु ने उद्धार कर
दिया।

     नवद्वीप में एक ब्राह्मण का लड़का रहता था, वह था बेजोड़ और पहले दर्जे का डाकू। सब चोर–डाकूओं का सरदार था वह। हिंसा और वध करने में उसे जरा भी भय नहीं लगता था। उसने देखा हमारे श्रीनिताईचाँद का अनेक स्वर्णमणि जटित अलंकार पहिरे हुए। मुक्ता-मणियों के हारों से अलंकृत। उस दुष्ट के मन में आ गई सब भूषणों को छुड़ाने की। श्रीनिताईचाँद के साथ-साथ घूमने लगा। ऊपर से बड़ी श्रद्धा-भावना, परन्तु मन में कपट और मौके की तलाश थी उसे। सर्वज्ञ शिरोमणि ने उसके कपट को जान लिया था। नवद्वीप में श्रीनिताई चाँद एक महा अकिंचन ब्राह्मण हिरण्य पण्डित के घर पर रह रहे थे। उस दुष्ट ब्राह्मण कुमार ने अपने चोर डाकू साथियों को तैयार कर लिया कि चलो आज सब कुछ उस अवधूत से उड़ा लाते हैं। वह अवधूत अकेला ही उस हिरण्य के घर मे सोता बैठता है। सबके सब छुरे, तलवार, लाठी आदि अस्त्र लेकर हिरण्य के घर की ओर चल पड़े। सब डाकू कुछ दूरी पर एक वृक्ष के नीचे रुक गए और एक व्यक्ति को वहीं की थांग लेने भेजा। उसने जाकर देखा-'अवधूत तो भोजन कर रहे हैं और उनके चारों ओर अनेक वैष्णव वैठे कृष्ण कीर्तन कर रहे हैं और आनन्दाविष्ट हो रहे हैं।लौटकर उसने सब हाल सुनाया। सरदार ने कहा-थोड़ी देर यहाँ रहो, भोजन कर लेने के बाद जब शयन करेंगे, तभी धावा बोलेंगे।वृक्ष के नीचे गोष्ठी करने लगे-एक बोला-'मैं तो उसके सब मुक्तामणि हार लूंगा।' दूसरा बोली-‘कानों के कुण्डल मेरे रहे। तीसरे ने कहा-चाँदी के नूपुर मेरे हिस्से में समझो'–इस प्रकार सब अपने-अपने मन के लड्डू बाँधने लगे। मायाधारी प्रभु की माया ऐसी कि सबको बारी-बारी से नींद आने लगी।सबके सब वहीं वृक्ष के नीचे गहरी नींद में पड़ गये-लगे लेने खर्राटे सारी रात निकल गई। प्रभात हो गया। मुर्गा बोला, कौए बोले, जो आँख खुली तो पाया सूर्य निकलने को है। सबके सब भागते बने। सबने लाठी आदि अस्त्र दूर बन में फेंके और गंगा के किनारे स्नान के बहाने चल पड़े। रास्ते में एक दूसरे को गाली देने लगे-वह कहे तूने नींद से जगाया क्यों नहीं ? दूसरा कहे, तू सोया ही क्यों ? वाद-विवाद करने लगे। ब्राह्मणपुत्र सरदार ने कहा-कोई बात नहीं, हल्ला मत करो ! एक दिन खाली गया, तो क्या सब दिन खाली जाएँगे ? हमने चण्डी देवी की रात पूजा नहीं की थी, इसलिए दाँव नहीं लगा। आज मद्य-मांस द्वारा चण्डी मनाओ और फिर रात को देखो, क्या होता है।

    उस दिन उन्होंने खूब चण्डी मनाई और रात्रि के अँधेरे में काले-नीले कपड़े धारण कर हथियार सम्हाले और प्रभु के मारने के लिए हिरण्य पण्डित के निर्जन भवन की ओर चले। घर पर घेरा डालने की सोच रहे थे कि दूर से देखा, वहाँ हिरण्य के घर के चारों ओर तो पहरेदार खड़े हैं, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं और उच्च-ध्वनि से 'हरेकृष्ण कहो ‘कृष्ण-कहो'-पुकार रहे हैं। न जाने ये पहरेदार कहाँ से आये ?

क्रमशः

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