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क्रम : 5⃣5⃣
*शची मिलन एवम दस्यु-उद्धार*
घर पर घेरा डालने की सोच रहे थे कि दूर से देखा, वहाँ हिरण्य के घर के चारों ओर तो पहरेदार खड़े हैं, अनेक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं और उच्च-ध्वनि से 'हरेकृष्ण कहो कृष्ण-कृष्ण कहो'-पुकार रहे हैं। न जाने ये पहरेदार कहाँ से आये ? सबके सब बड़े प्रकाण्ड शरीरधारी, अति बलशाली, तुलसी माला डाले, चन्दन लगाए हुए। श्रीअवधूत प्रभु बीच में सो रहे हैं—यह देखकर इन सबकी हिम्मत टूट गई।पीछे हट आये और एक किनारे बैठ गये। एक बोला-'मालुम होता है अवधूत को पता लग गया आज हमारे आने का। उसने सिपाही बुला लिए हैं। दूसरा बोला-हमने तो यह भी सुना है कि यह अवधूत बड़ा सिद्ध पुरुष है। उसी की यह कोई सिद्धि मालुम होती है। सरदार बोला-“इस अवधूत के दर्शन करने बड़े-बड़े सेठ–सेठानी आते-जाते रहते हैं, ऐसा लगता है वही अपने साथ पैदल सिपाही–रक्षक लाए हैं। अब लौट चलो घर को। कुछ दिन बाद फिर देखेंगे। लौट आए निराश होकर उस दिन भी सब चोर डाकू।
दस दिन के बाद फिर पहुँचे। घोर अँधेरा, आकाश में बादल है। हिरण्य के घर पर आते ही सबके सब अन्धे हो गए। कोई गिरा नाली में।किसी ने दीवार से ठोकर खाई। कोई खड्डे में जा पड़ा-हाथ-पांव की हड्डी टूट गई, लगा चिल्लाने हाय-हाय करके । किसी को सर्प ने काट खाया। एक तो काँटों की झाड़ी में जा फँसा।श्रीनिताईचाँद के सेवक इन्द्र ने जोर से वर्षा आरम्भ की।ओलों की चोट से माथे फटने लगे। परन्तु हाथ को हाथ नहीं सुझता। केवल प्राण नहीं निकले और सब कुछ हो गया। तब अकस्मात डाकु
ब्राह्मण-पुत्र के मन में विचार उठा आखिर यह बात क्या है ? मुझे यह लगता है ये अवधूत साधारण मनुष्य नहीं है, लोग इसे ईश्वर कहते हैं। यह बात है सत्य दीखती है। पहले दिन निद्रा ने हमें मोहित किया। दूसरे दिन उन दैव्य पार्षद पहरेदारों को देखकर भी हमें ज्ञान न हुआ। आज तो हम अपनी बुद्धि का यथेष्ट फल भोग ही रहे हैं हमारी इस घोर संकट से रक्षा करने वाला उनके सिवा और कौन हो सकता है? हमारी एक मात्र गति श्रीनिताईचाँद हैं-इस प्रकार मन में चिन्ता कर उसने सबको यह रहस्य बताया और हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रभु की स्तुति करने लगे-“हे गोपाल श्रीनित्यानन्द राम आप हमारी रक्षा करो। हे सर्वजनपाल ! हम आपकी शरण में हैं, आप हमारी रक्षा करो। हे करुणासिन्धो ! जो पृथ्वी पर ठोकर खाकर गिरता है, उसको पृथ्वी ही सम्हालती है। उसी प्रकार आपके प्रति अपराध करने वाले की एक मात्र शरण हैं। हम जैसा पापी और कोई नहीं है, परन्तु आप से बढ़कर पतितपावन भी और कोई नहीं है। हे दीनबन्धो ! हम आपकी शरण में हैं।आप हमारा उद्धार कीजिए।
इस प्रकार श्रीनिताईचाँद की शरण ग्रहण करते ही सबकी दृष्टि लौट आई। उन्होंने अपने को स्वस्थ किया और वहाँ से शीघ्र चले गए। जाकर स्नान किया। सरदार ब्राह्मण पुत्र रोता हुआ प्रभु के पास आया। श्रीनिताई चाँद परमानन्द में विराजमान थे। चारों ओर उनके पार्षदगण हरि-कीर्तन की ध्वनि कर रहे थे। दूर से ही आकर वह ब्राह्मण कुमार चरणों में गिर गया।
क्रमशः
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