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*शची मिलन एवम दस्यु उद्धार*
इस प्रकार श्रीनिताईचाँद की शरण ग्रहण करते ही सबकी दृष्टि लौट आई।उन्होंने अपने को स्वस्थ किया और वहाँ से शीघ्र चले गए। जाकर गंगा में स्नान किया। सरदार ब्राह्मण पुत्र रोता हुआ प्रभु के पास आया। श्रीनिताईचाँद परमानन्द में विराजमान थे। चारों ओर उनके पार्षदगण हरि-कीर्तन की मधुर ध्वनि कर रहे थे। दूर से ही आकर वह ब्राह्मण कुमार चरणों में गिर गया और मेरी रक्षा करो' हे पतितपावन ! मेरा अपराध क्षमा करो'–कहते हुए उसके नेत्रों से आंसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। चरण स्पर्श करते ही उसके शरीर में पुलक-कम्प होने लगे। उन्मत्त होकर हरिनाम ग्रहण करते हुए नाचने लगा। सबके सब पार्षद-भक्त विस्मित हो उठे कि इस महान् डाकू को आज क्या हो गया है ? क्या यह कपट पूर्वक ऐसा कर रहा है ? श्रीनिताईचाँद की लीला कोई नहीं जान पाया था।
परम करुणामय श्रीनिताई चाँद ने पूछा-अरे ब्राह्मण कुमार ! यह कैसा अदभत आचरण तुममें हम देख रहे हैं? बोलो तो निष्कपट होकर। सच कहो तुममें ऐसा परिवर्तन कैसे?डाकुओं के सरदार उस ब्राह्मण कुमार ने कहा-'प्रभु मुझसे क्यों कहलवाते हो–उसके नेत्रों से आँसू बह रहे थे, वाणी रुक गई थी उसकी। प्रभु ने कहा-नहीं-नहीं, तुम भय मत करो हमें सब वृत्तान्त सुनाओ।उसने आदि से अन्त तक अपना जीवन-वृत्तान्त कह सुनाया और वर्तमान घटना को भी सबके सामने कह सुनाया।
सुनकर सबके सब वैष्णव हरि-हरि ध्वनि करने लगे ब्राह्मण कुमार ने अनेक दीन वचन पूर्वक कहा-प्रभो ! जिस देह से आपकी हत्या का संकल्प मैंने किया उस देह को अब मैं नहीं रखना चाहता। अभी गंगा में जाकर डूब मरूँगा। प्रभो ! इतनी कृपा करो कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपके चरणों की भक्ति पाऊँ ।' प्रभु ने आश्वासन दिया–हे।ब्राह्मण कुमार ! तुम तो अति भाग्यवान हों प्रभु श्रीकृष्णचैतन्य ने तुम्हें अपनी महिमा दिखाई है। तुम पापों से मत डरो। वे सब पापियों को निष्पाप करने के लिए ही अवतीर्ण हुए हैं। मैं तुम्हारे सब पाप अपने ऊपर लेता हूँ तुम आज से पुनः पाप न करने की प्रतिज्ञा करो और अपने समस्त साथियों को भी पाप करने से रोको । सदा हरिनाम ग्रहण करने का व्रत धारण करो। इतना कहकर श्रीनिताईचाँद ने अपने गले की माला उतारकर उस ब्राह्मण कुमार के गले में डाल दी। चारों ओर जय-जय ध्वनि छा गई और उस ब्राह्मण कुमार के समस्त बन्धन नष्ट हो गए। वह रोते-रोते पृथ्वी पर गिर गया। प्रभु ने अपना चरण-कमल उसके मस्तक पर रख दिया। महान् भाग्य को प्राप्त कर वह ब्राह्मण कुमार निरपराध होकर श्रीहरिनाम ग्रहण करने लगा। साथ के जितने भी चोर डाकू थे उन्हें भी श्रीनिताईचाँद की शरण में ले आया और वे सब के सब सदाचार का आचरण करने लगे। वास्तव में जिस कृष्ण–प्रेम की प्राप्ति अन्यान्य अवतारों में सुर-मुनि देवताओं को भी दुर्लभ थी, करुणामय श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुपाद ने उसे चोर डाकुओं में वितरण कर उनका उद्धार कर दिया।
क्रमशः
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