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*संदेह भजन*
वस्तुतः श्रीनिताईचाँद का स्वरूप और व्यवहार वेद गुह्य है, लोकातीत है। परम योगेन्द्र आदिदेव धरणीधर हैं आप। सहस्र वदन नित्य शुद्ध कलेवर हैं-इनकी महिमा को श्रीचैतन्य की कृपा के बिना कोई नहीं जान सकता।
कोई इन्हें श्रीबलराम कहते हैं, कोई 'चैतन्य–प्रियधाम' और कोई महातेजस्वी,कोई परम भक्त, कोई परम ज्ञानी। कोई भी इनकी महिमा का पार नहीं पा सकता। जो भी हैं, श्रीवृन्दावनदास ठाकुरपाद कहते हैं, वे हमारे प्रभु हैं हम
उनके जन्म-जन्म के दास हैं। उनकी अद्भुत महिमा सुनकर भी जो श्रीनिताईचाँद की निन्दा करता है वह घोर पापी है, मेरे सामने आवे तो सिर पर लाठियों की मार दूँ। कैसी अनूठी निष्ठा है इष्टदेव में।
*एत परिहारे ये पापी निन्दा करे ।*
*तवे लाठि भारी तार शिरे उपरे ।।*
(श्रीचैतन्य भागवत ३-७-१२)
*नीलाचल प्रत्यागमन*
इस प्रकार श्रीनिताईचाँद प्रभु नवद्वीप में प्रेम-भक्ति के महानन्द-सागर में विहार कर रहे थे। गोप–बालकों के साथ जैसे गोकुल में घर-घर बलराम रूप में विहार करते थे, उसी प्रकार यहाँ भी भक्तों के साथ निरन्तर कृष्ण-चैतन्य नाम उच्चारण पूर्वक नृत्य-गीत करते हुए घर-घर में विहार करते हैं।
एक दिन श्रीनिताईचाँद के मन में गौरचन्द्र के दर्शन की अभिलाशा हुई-इच्छामय तो हैं ही। माता शची के पास आये और उनकी आज्ञा लेकर नीलाचल की तरफ चल दिये। श्रीनिताईचाँद की इच्छा थी क्या यह नहीं-नहीं, श्रीगौरचन्द ही इन्हें देखना चाह रहे थे।
परम विहल पार्षदों के साथ श्रीचैतन्य नाम गुणगान करते हुए चले जा रहे थे। कभी हुँकार-गर्जन करते, कभी नृत्य और कभी उच्च स्वर में आनन्द-क्रन्दन करने लगते । इस प्रकार सारे मार्ग में प्रेमानन्द आस्वादन करते-कराते कुछ दिनों में आप नीलाचल के निकट जा पहुँचे। कमलपुर में आकर जब आपने श्रीजगन्नाथ मन्दिर की शिखा के दर्शन किये तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। पार्षदों ने जैसे-तैसे आपको चेतना कराई और निकटवर्ती पुष्प उद्यान में ले आये।
श्रीगौरचन्द्र तो इनकी प्रतीक्षा में थे ही। सब भक्तों से छिपकर अकेले ही वहाँ आ पहुँचे। श्रीनिताईचाँद ध्यान में मग्न थे-परमशान्त रूप में विराजमान |प्रभु श्रीगौरांग इस छटा के दर्शन करने, लगे इनकी प्रदक्षिणा करने और श्लोक पढ़ने लगे-
*गृहणीयाद् यवनीपाणिं विशेद्वा शोण्डिकालयम् ।*
*तथापि ब्रह्मणो वन्द्यं नित्यानन्दपदाम्बुजम् ।।*
श्रीनित्यानन्द यदि यवनी के साथ विवाह करें अथवा मद्य-विक्रेता के घर मे प्रवेश करें तो भी श्रीनित्यानन्द के चरण ब्रह्म पूजनीय हैं।
श्रीमनमहाप्रभु जी यह श्लोक पढ़ते जा रहे थे और श्रीनिताई चाँद की प्रदक्षिणा करते जा रहे थे।
क्रमशः
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