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*नीलांचल प्रत्यागमन*
श्रीनिताई चाँद ने जब ध्यान में प्रभु को नहीं देखा। झट आंखें खुल गई और हरि-बोल' कहकर उठ खड़े हुए। सामने श्रीगौरचाँद को देखकर इनके आनन्द की सीमा न रही। हरि-बोल' का सिंहनाद कर बार-बार पृथ्वी पर पछाड़े खाकर गिरने लगे। दोनों एक दूसरे की प्रदक्षिणा करने लगे। एक दूसरे को दण्डवत् प्रणाम करने लगे। कभी दोनों आलिंगन करते तो कभी गलकण्ठ होकर आनन्दपूर्ण क्रन्दन करने लगते। दोनों के शरीर पर अश्रु, कम्प, हर्ष, पुलक, मूच्र्छा, वैवयं आदि श्रीकृष्णभक्ति के विकार छा गये। थोड़ी देर बाद श्रीगौरांग दोनों हाथ जोड़कर श्रीनिताईचाँद की इस प्रकार स्तुति करने लगे-
• *श्रीचैतन्यकृत स्तुति* •
*नाम रूपे तुमि नित्यानन्द मूर्तिमन्त।*
*श्रीवैष्णव धाम तुमि-ईश्वर अनन्त ।।*
*यत किछु तोमार श्रीअंग अलंकार।*
*सत्य सत्य सत्य भक्तियोग अवतार ।।*
*स्वर्ण-मुक्ता-रूपा-कसा-रुद्राक्षादि रूपे ।*
*नवविधा भक्ति धरि आछे निज सुखे ।।*
*नीच जाति पतित अधम यत जन ।।*
*तोमा' हैते सभार हइल विमोचन।।*
*ये भक्ति दियाछ तुमि वणिक-सभारे।*
*ताहा वाञ्छे सुर सिद्ध मुनि योगेश्वरे ।।।*
*‘स्वतन्त्र' करिया वेदे ये कृष्णेरे कहे।*
*हेन कृष्ण पार तुमि करिते विक्रय ।।*
*तोमार महिमा जानिवार शक्ति कार।*
*मूर्तिमन्त तुमि कृष्णरस-अवतार ।।।*
*बाह्य नाहि जान तुमि संकीर्तन सुखे ।*
*अहर्निश कृष्णगुण तोमार श्रीमुखे ।।*
*कृष्णचन्द्र तोमार हृदये निरन्तर ।।*
*तोमार विग्रह कृष्ण विलासेर घर ।।।*
*अतएव तोमारे ये जने प्रीति करे।*
*सत्य सत्य कभु कृष्ण ना छाडेन तारे ।।*
इस प्रकार श्रीमन्महाप्रभु जब श्रीनिताईचाँद की स्तुति करने लगे, तो अति विनीत होकर बोले-हे गौरांगदेव ! आप जो मेरी इस प्रकार स्तुति रहे हैं, यह सब आपकी भक्तवत्सलता है। आप मेरी प्रदक्षिणा करो,या नमस्कार ,आप मुझे जिलाओ या मारो-यह आपकी इच्छा है। मुझे आपके प्रति कुछ कहना नहीं है। मेरे मन इन्द्रिय, प्राण प्रभो ! सब कुछ आप ही हो।श्रीनिताईचाँद आप मुझे नचाते हो, वैसे ही मैं नाचता हूँ। आपने ही मुझे संन्यासी बनाकर हाथ में दण्ड पकडाया और फिर आपने ही उसे त्याग करवा दिया।अन्यान्य भक्तों को तो हे गौरांग ! आपने तपस्या भक्ति का आचरण दिया है और मुनि धर्मों का त्याग कराकर न जाने मुझे क्या बना दिया है। संसार के लोग मुझे देखकर परिहास करते हैं परन्तु मैं तो आपकी कठपुतली हूँ जैसे -मुझे नचाओ-आपकी इच्छा है-
*तोमार नर्तक आमि नाचाओ ये रूपे ।*
*सेइरूपे नाचि आमि तोमार कौतुके ।।*
*के विग्रह अनुग्रह, तुमि से प्रणाम्।*
*वृक्षद्वारे कर, तभु तोमारई से नाम ।।*
मेरी जो अवस्था है-यह आपका मेरे प्रति निग्रह (दण्ड) है या अनुग्रह आप ही जानते हो, मैं नहीं जानता। मेरी क्या चली प्रभो ! तुम जो चाहो वह एक वृक्ष (जड़) से भी करवा सकते हो। परन्तु वृक्ष जो करेगा, उसमें नाम आपका ही होगा। ऐसे ही आप जो कुछ मुझसे करा रहे हो, भला या बुरा वह आपका ही दायित्व है ।श्रीगौरांग बोले-प्रभुपाद ! आपके शरीर पर जो अलंकार हैं, ये श्रवण-कीर्तन स्मरण आदि अंग ही हैं।श्रीशिवशंकर सपों को भूषण रूप में धारण करते हैं-इसका मर्म सब लोग नहीं जानते हैं। वस्तुतः श्रीअनन्तदेव-सहस्रवदन श्रीमहादेव को अति प्रिय हैं, प्राणों के समान प्यारे हैं, क्योंकि श्रीअनन्तदेव अपने सहस्र मुखों से श्रीकृष्ण के नित्य नवीन नामों का उच्चारण करते हैं।उसी प्रकार आप जो अलंकार धारण कर रहे हो-ये सब नवविधा भक्ति के ही अंग हैं, परन्तु यह रहस्य सब लोग नहीं जान पाते। मुझे तो तुम्हारे शरीर में
भक्ति-रस को छोड़कर और कुछ नहीं दीखता। ब्रज में भी भैया ! तुम्हारे वेत्र,वंशी, शृंग, गुंजाहार, माला, गन्ध–ताम्बूल आदि युक्त श्रीविग्रह की शोभा देखकर सब ग्वाल-बाल भी चमत्कृत हो उठते थे एवं मेरे और आप में कुछ भेद नहीं देखते थे।
इस प्रकार आज दोनों आनन्द सागर में निमग्न हो एक दूसरे की अपार महिमा का वर्णन करते हुए अघाते नहीं थे।
क्रमशः
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