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*नीलांचल प्रत्यागमन*
इस प्रकार आज दोनों आनन्द सागर में निमग्न हो एक दूसरे की अपार महिमा का वर्णन करते हुए अघाते नहीं थे। कुछ देर बाद दोनों को बाह्य हुआ और दोनों प्रभुपाद उस पुष्प-उद्यान में एकान्त स्थान पर जा बैठे। ईश्वर (श्रीनिताईचाँद) परमेश्वर (श्रीगौरचाँद) में परस्पर क्या बात हुई यह कौन जाने ? वेद भी इनके तत्त्व को नहीं जान पाता।
कुछ देर परस्पर विचार-विमर्श कर श्रीमन्महाप्रभु श्रीनिताईचाँद के साथ
पुष्प-उद्यान से अपने निवास स्थान पर चले आए।श्रीनिताईचाँद परम हर्षित होकर श्रीजगन्नाथ के दर्शन करने मन्दिर में चले आए। दर्शन करते ही प्रभु आनन्द से विह्वल हो उठे। पुजारी सेवकों ने श्रीजगन्नाथ की प्रसादी माला आकर प्रभु के गले में डाली । प्रेमानन्द अश्रुजल से अभिसिक्त होकर वहाँ से श्रीगदाधर जी के पास आए।।
श्रीगदाधर जी के प्रति अतिशय प्रीति मानते थे श्रीनिताईचाँद । इनके भवन में श्रीमोहन गोपीनाथ का श्रीविग्रह साक्षात् नन्दनन्दन के सदृश विराजमान था। उनके दर्शन के लिए श्रीनिताई चाँद जब वहाँ आए तो श्रीगदाधर अपने भागवत पाठ को छोड़कर प्रभु के पास आए और दोनों अश्रुजल पूर्ण नेत्रों से एक-दूसरे के गले लगे एक दूसरे को उन्होंने प्रणाम किया। अटूट श्रद्धा थी श्रीगदाधर की श्रीनिताईचाँद के प्रति । उनका संकल्प था कि वे श्रीनिताईचाँद के निन्दक का मुंह नहीं देखते थे। जिसकी श्रीनिताईचाँद में प्रीति न होती थी, उसे अपने दर्शन भी नहीं देते थे।श्रीगदाधर जी ने प्रभु को भिक्षा का निमन्त्रण दिया। उन्होंने सुन्दर-सुन्दर व्यञ्जन तैयार कर श्रीगोपीनाथ जी को भोग धराया।
इतने में श्रीगौरांग भी वहाँ आ पहुंचे और बोले-गदाधर ! क्यों हमारा आज इस निमन्त्रण में भाग नहीं है ? श्रीगदाधर के आनन्द की सीमा न रहीं। उन्होंने श्रीमन्महाप्रभु एवं श्रीनिताईचाँद को भगवत प्रसाद की भिक्षा कराई।दोनों प्रभुपादों ने प्रसाद की भूरि-भूरि प्रशंसा कर गदाधार के भाग्यों की सराहना की। महानन्द में हास-परिहास कर श्रीमन्महाप्रभु अपने निवास स्थान पर चले आए। श्रीनिताईचाँद श्रीगदाधर के पास ही नीलाचल में निवास करने लगे।
क्रमशः
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