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*गौडदेश प्रत्यावर्तन*
श्रीमन्महाप्रभु के दर्शन करने के लिए गौड़देशवासी अवसर पर नीलाचल जाया करते थे और चातुर्मास्य वहाँ ही व्यतीत करते ।इस वर्ष जब सब गौड़ीय भक्त श्रीमन्महाप्रभु के दर्शन के श्रीनिताईचाँद वहाँ पहले ही विद्यमान थे। रथ यात्रा आदि दर्शन कर चातुर्मास्य वहाँ व्यतीत किया। श्रीमन्महाप्रभु प्रायः प्रतिदिन श्रीनिताई एकान्त में ले जाकर कुछ विचार–परामर्श करते थे। एक दिन देर परामर्श करने के बाद जब श्रीमन्महाप्रभु भक्तों में आकर विराजमान श्रीअद्वैताचार्य प्रभु ने कुछ तज्ज़ा–पहेली की-सी बात कही और श्रीमनमहाप्रभु ने भी इशारे में कुछ जवाब दिया। आचार्यपाद ने क्या पूछा और क्या कहा-यह कोई भी न समझ सका,श्रीमहाप्रभु श्रीअद्वैताचार्य के मुंह की देखकर हँसने लगे और श्रीअद्वैताचार्य हर्षित होकर नाचने लगे ऐसा था कि श्रीमन्महाप्रभु की कोई बात श्रीनिताईचाँद ने अंगीकार कर लें।जिसकी प्रार्थना श्रीअद्वैताचार्य ने कर रखी थी। क्या थी वह प्रार्थना, पुन: क्या आज्ञा दी श्रीनिताईचाँद को–यह कोई भी कुछ समझ न सका।।
इतने में श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीनिताईचाँद को आलिंगन किया और बोले-श्रीपाद । मैं आपसे कुछ मांगता हूँ और कृपाकर उसे प्रदान करो।।
श्रीनिताईचाँद बोले-प्रभो ! वह क्या ?
प्रभु बोले-वह यह है कि आप प्रतिवर्ष नीलांचल न आया करें।गौड़ देश मे रहकर मेरी अभिलाषा को पूरा करने की कृपा करें।मेरी अभिलाषा को पूर्ण करने वाला आपको छोड़कर और कोई नहीं है।
मेरा यह दुष्कर कार्य केवल आप से हो पायेगा।”
श्रीनिताईचाँद ने कहा-
*..................आमि देह तुमि प्राण।*
*देह प्राण भिन्न नहे, एइत प्रमाण ।।।*
*अचिन्त्यशक्त्ये कर तुमि ताहार घटन।*
*ये कराह, से–इ करि नाहिक नियम ।।*
मैं तो देह हूँ और आप हैं मेरे प्राण। देह और प्राण भिन्न नहीं होते। गौर सुंदर आप अपनी अचिन्त्य शक्ति से सब दुष्कर कर्म करा सकते हो।आप जो कराओ, मैं वही करूँगा, करना न करना मेरे लिए कोई नियम नहीं है।यह सुनकर श्रीगौरांग सुन्दर ने श्रीनिताईचाँद को आलिंगन किया और बोले-हे प्रभुपाद ! आप सब गौडदेश में जाकर गृहस्थ को स्वीकार कीजिए।इन संसार वासी जीवों का निस्तार सम्भव है। मैं पुनः तुम्हारे घर में आकर अवतीर्ण होऊँगा और भक्तिदान देकर सब संसार का उद्धार करूंगा।
यह अवतार मेरा गुप्त है। शास्त्र में भी उसका प्रचार नहीं है। मेरी–अचिन्त्य शक्ति को, हे निताईचाँद ! तुम्हारे जनाये बिना कोई भी नहीं जान सकता। आपने यदुवंश में श्रीबलराम रूप से अवतार लेकर द्वापर में अपने वंश के विस्तार नहीं किया था। अब संसार में आपके वंश की वृद्धि होगी।
श्रीनिताईचाँद से और कुछ न कहते बना, बोले करुणामय ! आप ही सबके नियामक हैं, आप ही सब कुछ करने वाले हैं। मैं तो कठपुतली हैं। आप जैसे चाहें नचा लो, जहाँ चलाओ चला लो, जहाँ रखो, जैसे रखो वहीं रहूँगा ! प्रभो ! समस्त विश्व आप द्वारा नियन्त्रित है। विशेषतः मेरे तो हर्ता, कर्ता, भर्ता हो, विकर्म, सुकर्म जो भी कराओ, आपकी इच्छा है। मुझे अवधूत बनाकर सारे संसार में घुमा डाला और आप नवद्वीप में आकर छिपे रहे।कृपाकर आपने मुझे अपने निकट बुला लिया और दर्शन दे कृतार्थ किया।
क्रमशः
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