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श्रीनिताई चाँद*

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*गौड़ देश प्रत्यागमन*

   श्रीनिताईचाँद से और कुछ न कहते बना, बोले करुणामय ! आप ही सबके नियामक हैं, आप ही सब कुछ करने वाले हैं। मैं तो कठपुतली हूँ। आप जैसे चाहें नचा लो, जहाँ चलाओ चला लो, जहाँ रखो, जैसे रखो वहीं रहूँगा, वैसे रहूँगा ! प्रभो ! समस्त विश्व आप द्वारा नियन्त्रित है। विशेषतः मेरे तो आप ही हर्ता, कर्ता,भर्ता हो, विकर्म, सुकर्म जो भी कराओ, आपकी इच्छा है। मुझे अवधूत बनाकर सारे संसार में घुमा डाला और आप नवद्वीप में आकर छिपे रहे। कृपाकर आपने मुझे अपने निकट बुला लिया और दर्शन दे कृतार्थ किया। अनेक नाच नचाये आपने। फिर मुझे आपने अलंकार भूषणों से सजा दिया, पान-चन्दन कर्पूर एवं रेशमी वस्त्रों को धारण करा दिया। मैं यह सब कुछ नहीं जान पाया कि आप क्या करना चाहते हो ? अब मुझे फिर संसार करने की आज्ञा दे रहे हैं ? यह मुझ पर आपका निग्रह है या अनुग्रह ? मेरी तो आप ही एकमात्र गति हैं, प्रभो ! मैं तो आपका आज्ञाकारी दास ही हूँ। आज्ञा का पालन ही मेरा परम धर्म है। यह कहकर श्रीनिताईचाँद चुप हो गए।

   श्रीगौरांग ने श्रीनिताईचाँद का हाथ पकड़ कर कहा “नित्यानन्द आप तो मूर्तिमान नित्य-आनन्द हैं। मेरे सुख सम्पत्ति के एक मात्र तुम हो विधान हो। मैं शक्तिमान हूँ तुम मेरो शक्ति हो। शक्ति के बिना शक्तिमान का क्या मूल्य ? तुम्हारा मेरा कुछ भी भेद नहीं है। इस कलिकाल में अपने कार्यसाधने के लिए अवतीर्ण हुआ हूं तुम्हारी सहायता के बिना मेरा अभीष्ट कैसे सिद्ध होगा ?

   श्रीनिताईचाँद ने नेत्रों में आँसू भरकर कहा-रहने दो प्रभो ! यह सब कपट की बातें। पहले भी तो आपने गोपियों को ऐसा झाँसा दिया था माता-पिता, पति-पुत्र,सखा सबको आपने उनसे छुड़वा दिया था। जो सब कुछ आपके लिए छोड़ देते हैं, उन्हें आप छोड़ देते हो, यह आपकी पुरानी आदत है। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं आपकी।मैं तो आपका दास हूँ ,मैं आपकी इस आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ? यह बताओ, अब कि आपके दर्शन कब होंगे। मैं आपके विच्छेद दुःख को कैसे सहन करूंगा ?श्रीगौरांग बोले-“श्रीनिताईचाँद ! आप प्रति वर्ष यहाँ नीलाचल न आना। जब भी आप इच्छा करोगे मैं वहीं आपको आकर मिलूंगा। आपके नृत्य में और माँ-शची के रंधन-समय में मैं अवश्य तुम्हें दीखुंगा। थोड़े ही दिनों में मैं इस लीला को अप्रकट कर तुम्हारे पास रहूँगा।।

  इस प्रकार कथोपकथन कर दोनों एक दूसरे को गलकण्ठ कर उच्चस्व से रोने लगे और सारी रात बातों ही बातों में बीत गई। सवेरे नित्य क्रिया से निवृत्त होकर प्रभु के साथ-साथ श्रीनिताईचाँद ने श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन किये उसी दिन से श्रीनिताईचाँद हर समय श्रीकृष्ण-विरह की बात चलाते ।श्रीगौरांग ने सब भक्तों को तीर्थयात्रा के बहाने इधर-उधर जाने का आदर दिया। सब भक्त एक-एक करके प्रभु से विदा हो गए। श्रीनिताईचाँद भी प्रभु का आदेश पाकर कई एक साथियों को लेकर गौडदेश की ओर चल पड़े । गंगा के किनारे-किनारे पहले की तरह प्रेमानन्द में नृत्य करते। जीवों को प्रेमानन्द का दान देते-देते आप पानिहाटी ग्राम में श्रीराघव के घर पहुंचे।

श्रीराघव के घर श्रीनिताईचाँद का आगमन जानकर असंख्य भक्त वहाँ आकर जमा हुए और निरन्तर कृष्ण-कीर्तन में उन्मत्त हो उठे। दूर देश से लोग आकर वहाँ एकत्रित हो गये दिन में प्रसाद भोजन और रात्रि में कीर्तन का अपूर्व आयोजन। श्रीनिताईचाँद की अद्भुत-नर्तन-भंगी, मनोहर श्रृंगार तो देखते ही बनता था। शिर पर लटपटी पाग, कानों में कुण्डल, वदनचन्द की कान्ति से चन्द्र फीका लगता था। भुजाओं में अंगद, हाथों में कड़े,अँगुलियों में अँगूठियाँ, गले में नीलमणियों की मालाएँ हिलोरे लेती थीं । चरणों में सोने के नूपुर मधुर गुंजार करते थे जिनकी ध्वनि मात्र ही समस्तपाप–सन्तापों को नष्ट करने वाली थी। नेत्रों से अजस्र अश्रुधारा लोल-कपोलों को अभिषिक्त करते हुए पृथ्वी का सिंचन करती थी। सिंह की तरह ग्रीवा, गज की तरह उन्नत स्कन्ध, गौर–वर्ण प्रकाण्ड विशाल शरीर आजानुलम्बित विशाल भुजायें प्राणिमात्र को प्रेमालिंगन प्रदान करने के लिए चञ्चल हो रही थीं। अरुण–वर्ण घूर्णित नेत्रकमल मन्दहास्य से मण्डित हो कभी मुंद जाते और कभी विस्फारित हो श्रीकृष्ण का चारों ओर अन्वेषण करने लगते । इस प्रकार अनेक दिन पानिहाटी ग्राम में निताईचाँद ने अपनी अनुपम रूप–माधुरी से संकीर्तन विलास करते हुए असंख्य लोगों को कृष्ण-कीर्तनमें विह्वल कर दिया।

क्रमशः

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