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    *विवाह लीला*

           एक दिन निवास के आंगन में श्रीकृष्णनाम-संकीर्तन का महान आयोजन किया गया, जिसमें प्रायः समस्त नवद्वीपवासी एवम श्रीअद्वैताचार्य प्रभुपाद भी सम्मिलित हुए। अद्भुत संकीर्तन आनन्द में सब विभोर हो उठे।निताईचाँद के प्रेमावेश एवं उल्लास का तो कहना ही था। इनकी रुप–छटा माधुरी सबके मन को हर्षित कर रही थी। अदभुत श्रृंगार था नख से सिर तक। मणिमय स्वर्ण जटित अनेक अलंकारों से अलंकृत था आपका श्रीविग्रह। महाज्योति पुंज विछूरित हो रहा था चारों ओर । इस अनुपम छटा का दर्शन करते ही सबके मन में ऐसी एक तीव्र इच्छा जाग उठी कि श्रीनिताईचाँद प्रभु के नव-दुलह रूप में दर्शन करें। नव दुलहिन इनके रूप के अनुरूप यदि इनके वामांग में सुशोभित हो तो नेत्रों को चरितार्थ करें।

   अद्वैताचार्य प्रभुपाद अनेक दिन पहले श्रीमन्महाप्रभु के पीछे पड़े हुए थे कि किसी प्रकार श्रीनित्यानन्द को उनके विवाह के लिए तैयार करें। यहीं कारण था और यही रहस्यमय विषय था कि नीलाचल में बार-बार श्रीनिताईचाँद को एकान्त में ले जाकर अनेक समय तक विचार परामर्श कराते रहते थे। उनकी स्वीकृति पर श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीअद्वैताचार्य प्रभु को आश्वासन दे ही दिया था और स्वयं भी सब भक्तों के सामने श्रीनिताईचाँद का स्पष्टादेश दे चुके थे।

भगवान की इच्छा-शक्ति ही सब लीलाओं का समाधान और सम्पादन करती है। उसे देर कितनी लगती है ?नवद्वीप से थोड़ी दूर सालिग्राम गांव था जहाँ पण्डित श्रीसूर्यदास वास करते थे। वह गौड़देश के राजा के कुशल कर्मचारी थे। उनकी दो कन्यायें थीं वसुधा एवं जाह्नवी। रूप-गुण में सर्वतोभावेन अनुपम थीं वे| श्रीसूर्यदास ने उनके सम्बन्ध के लिए एक बुद्धिमान ब्राह्मण के जिम्मे लगा रखा था। वह ब्राह्मण भी दैवयोग से उस संकीर्तन आयोजन में दर्शन करने आया था। वहाँ से सीधे जाकर उस ब्राह्मण ने श्रीनिताई चाँद के रूप सौन्दर्य एवं अलौकिक गुणों का वर्णन कर श्रीसूर्यदास पण्डित उनके साथ उनकी कन्याओं के सम्बन्ध का प्रस्ताव किया। यह भी कहा कि यदि श्रीनिताईचाँद भी अनुग्रह कर इस सम्बन्ध को स्वीकार करें तो इससे बढ़कर तुम्हारा सौभाग्य नहीं हो सकता। पण्डित सूर्यदास ने उस ब्राह्मण को सम्मानोचित जवाब न दिया। ब्राह्मण कुछ निराश होकर अपने घर पर आया।

    उसी समय से पण्डित जी का मन अस्थिर हो गया और सोचने लगे-क्या एक अवधूत संन्यासी के लिए अपनी कन्याएँ विवाह दें ? लोग क्या कहेंगे ? क्या फिर एक अवधूत संन्यासी विवाह के लिए प्रस्तुत भी हो जायगा ? ब्राह्मण का प्रस्ताव मुझे तो निराधार दीखता है। ऐसा सोचते-सोचते पण्डित रात्रि को सो गए। रात में एक अद्भुत स्वप्न देखा। सवेरे सब परिवार के लोगों को स्वप्न की बात सुनाने लगे-“कोई एक महाजन तालध्वज रथ पर सवार होकर मेरे घर पर आकर रुका अद्भुत पराक्रमशाली, अतिशय रूप-गुणवान दिखाई देता था वह। उसके कन्धे पर हल-मूसल था। मुस्कराते हुए मुझसे पूछने लगा–सूर्यदास पण्डित का क्या यही मकान है ? क्या तुम ही सूर्यदास हो ?जब मैंने अपना परिचय दिया कि-कहिए, मैं ही हूँ सूर्यदास, तो वह मुझसे बोला मैं तुम्हारी कन्या से विवाह करूंगा। तुम मुझे पहिचान नहीं पाये अब तक ?" मैं चौंक उठा, मेरी निद्रा भंग हो गयी। मेरी आँख खुली तो कुछ भी नहीं था।कुमारी वसुधा भी तो घर में भीतर थी। पिता का स्वप्न सुनकर उसका स्वाभाविक प्रेम उछल पड़ा। ओढ़नी से अपना मुंह ढक लिया उसने। नेत्रों से तो आँसू टपक ही पड़े।

*प्रेम छिपाये न छिपे जा घट परगट होय ।*
*मुँह से कुछ न बोलिये नैन देत हैं रोय ।।*

   सारा आँचल आँसुओं से भीज गया। प्रेम के विकार कम्प, पुलके ही वसुधा के शरीर में।

क्रमशः

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