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*विवाह लीला*
सारा आँचल आँसुओं से भीज गया | प्रेम के विकार कम्प, पुलक हो उठे वसुधा के शरीर में | मूर्च्छित हो गिर पड़ी। वसुधा की यह दशा देख अन्तःपुर में कोलाहल मच गया-देखो ! देखो !! हाय ! हाय ! वसुधा को क्या हो ।गया? हाय ! हाय यह तो गिर पड़ी। पण्डित सूर्यदास भागे-भागे अन्दर गए। सब आस-पड़ोस के लोग जमा हो गए। किसी ने नाड़ी पर हाथ रखा,किसी ने ‘पानी लाओ, ‘पानी लाओ' आवाज दी। दूसरे ने कहा-देखो तो इसके अंग ठंडे पड़ गए हैं, इसके तो नत्र ऊपर को चढ़ गए हैं।कोई भागकर वैद्य-चिकित्सक वहाँ ले आया। असाध्य सन्निपात रोग निर्धारण कर उन्होंने बचने की कोई आशा न बताई। इसकी ओषधि तो अब गंगाजल-तुलसीदल है। इसके परमार्थ की चेष्टा करो। ओषधि कोई काम नहीं करेगी। वैद्य के वचन सुनकर सूर्यदास पण्डित अधीर हो रोने लगे।
श्रीसूर्यदास के छोटे भाई श्रीगौरीदास वहाँ उपस्थित थे, उन्होंने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा-भाई ! आपने रात्रि को ब्राह्मण को निताईचाँद के सम्बन्ध में कुछ उचित जवाब नहीं दिया, निराश कर लौटा दिया है-मैं समझता हूँ यह सब उसी का फल है।श्रीनिताईचाँद अवधूत के प्रति अपराध बन गया। अब जैसे बने उस ब्राह्मण को बुलाकर सम्बन्ध की बात करने के लिए नवद्वीप भेज दो। प्राण इस कन्या के बच गए तो उनकी है, वरना कैसा सम्बन्ध ?
पण्डित सूर्यदास स्वयं ही उस ब्राह्मण के घर भागे-भागे गए और अति शीघ्र उसे नवद्वीप जाने को कहा-श्रीनिताईचाँद के सम्बन्ध की बात पक्की कर शीघ्र हमें सूचित करो-ऐसा कहकर पण्डित जी घर लौटे। आश्चर्य चकित हो उठे वसुधा कुछ चेतन अवस्था में आयी।निराशा आशा में बदल गई। सूर्यदास मन ही मन श्रीनिताईचाँद से प्रार्थना करने लगे-प्रभो ! वर्णाश्रम धर्म के झूठे अभिमान ने मुझे धोखा दिया। आपकी माया ने मुझे भ्रम में डाल दिया। मेरा अपराध क्षमा करो और वसुधा को ग्रहण कर अपनी धरोहर को सम्हालो। इस कन्या को प्राण दान दो। सर्वान्तर्यामी श्रीनिताईचाँद ने अपनी कृपादृष्टि का निक्षेप किया। वसुधा में नये प्राणों का संचार हो उठा। झट
स्वस्थ होकर अपने मुंह को ढकते हुए भीतर के कमरे में चली गई।
वह ब्राह्मण दो चार साथियों के साथ नवद्वीप में श्रीवास के घर पहुँचा जहाँ कन्दर्पमोहन श्रीनिताईचाँद दिव्य-आसन पर विराजमान थे। उस ब्राह्मण ने आपके दर्शन कर नेत्रों को सफल किया। श्रीवास पण्डित ने कुशल प्रश्न किया। ब्राह्मण ने सब समाचार कह सुनाया।श्रीवास प्रफुल्लित हो उठे।श्रीनिताईचाँद की मधुर मुसकान में उनकी सहमति जानकर उन्होंने ब्राह्मण को पूर्ण स्वीकृति देकर विदा किया और कहा कि हम लोग कल ही बड़गाछी ग्राम के लिए रवाना हो जायेंगे। ब्राह्मण अति हर्षित होकर पण्डित श्रीसूर्यदास के पास लौट आया और आकर सब शुभ समाचार कह सुनाया। सबके सब परमानन्दित हो उठे और लगे करने विवाह की तैयारी ।
श्रीवास पण्डित ने श्रीअद्वैताचार्य को समाचार भेजा। वे फूले न समाये |
बड़गाछी निवासी श्रीकृष्णदास जो श्रीहरिहाड़ का पुत्र था और श्रीनिताईचाँद
में अटूट निष्ठा थी जिसकी, उसने श्रीअद्वैताचार्य एवं श्रीवास पण्डित से अनेक बार प्रार्थना कर रखी थी कि श्रीनिताई चाँद के विवाह आयोजन की सेवा मैं करूंगा। श्रीवास ने श्रीकृष्णदास को बुलाया और विवाह के आयोजन की आज्ञा दी।
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