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*श्रीनिताई चाँद*

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*विवाह लीला*

    श्रीवास ने श्रीकृष्णदास को बुलाया और विवाह के आयोजन की आज्ञा दी। श्रीकृष्णदास सुनते ही नाच उठा और उसी समय बडगाछी को चल दिया सब बन्दोबस्त करने के लिए।नदिया में सर्वत्र श्रीपाद के विवाह का आनन्द समाचार तेजी से फैल गया। दूसरे दिन श्रीनिताईचाँद को साथ लेकर श्रीवासादि सब बड़गाछी गावँ के लिए चल दिये श्रीकृष्णदास के घर पर सब के निवास स्थान का प्रबन्ध था,सब ने वहाँ निवास किया। ग्रामवासी प्रभु को देखकर परमानन्दित हो उठें।

    पण्डित सूर्यदास ने जब यह समाचार सुना तो वे भी श्रीगौरीदास आदि बन्धुबान्धवों को लेकर पूजन सामग्री तथा ब्राह्मणों को लेकर बड़गाछी गाँव पहुँचे। श्रीनिताईचाँद के दर्शन कर पण्डित सूर्यदास ने उनके चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया। कुछ कहना चाहते थे परन्तु प्रेमाश्रु से गला अवरुद्ध हो गया। प्रभु ने श्रीसूर्यदास को आलिंगन किया। श्रीगौरीदास तो विह्वल हो रहे थे।

     उपस्थित सब विद्वान् ब्राह्मणों ने विचार–परामर्श के बाद निश्चय किया कि श्रीनिताईचाँद का पुनः यज्ञोपवीत संस्कार किया जाय और फिर विवाह प्रभु के सामने इस प्रस्ताव को रखा गया। श्रीनिताईचाँद तो अट्टहास करने लगे-'तुम्हारी इच्छा' मेरा कुछ भी दायित्व नहीं सब जानें मेरे प्राण श्रीगौरांग,ऐसा कहकर मानो स्वीकृति ही प्रदान कर दी। सब सामग्री जुटाई गई
राजपुत्र के यज्ञोपवीत तथा विवाह की तरह बड़ा भारी आयोजन किया जाने लगा।

    ब्राह्मणगण यज्ञकाष्ठ, पुष्प, कुश, कुशासन आदि लेकर आ पहुँचे। दण्ड कमण्डलु छाता, पादुका, घी, मेखला, कोपीन, काली मृगछाला तथा जनेउ सब सामग्री ब्राह्मणों ने सजाकर रखी और वेद-विधि अनुसार यज्ञादि सम्पादन कर पुरोहित बोले, 'आगच्छ नित्यानन्द'-नित्यानन्द आगे आओ। श्रीनिताईचाँद ब्राह्मण मण्डली के बीच बैठ गए और लगे देने आहुति।ब्राह्मण वेद-मन्त्रों की मधुर-ध्वनि करने लगे। पुरोहित ने दण्ड–कमण्डलु हाथ में दिया और कोपीन
धारण करा दी। कन्धे पर वस्त्र लटकाकर सजा दिया श्रीनिताईचाँद को ब्रह्मचारी के रूप में। ब्राह्मण ने कहा -‘नित्यानन्द ! जाओ सबके पास और बोलो–“भवति भिक्षां देहि।” माता मुझे भिक्षा दो ! सूर्यदास की गृहणी तथा अन्यान्य रमणी-गण सोने-चाँदी की मुद्रा डालने लगीं झोली में। अद्भुत
मनमोहनी छबि थी आज ब्रह्मचारी निताई की। पांव में पादुका, कन्धे पर छाता रखे, कोपीन धारण किए हाथ में दण्ड–कमण्डलु ले भिक्षा के लिए प्रत्येक नर नारी के सामने जा रहे थे भिक्षा कर रहे थे या सर्व अमंगल ही हर रहे थे सबके । साक्षात् श्रीवामन भगवान् ही पधारे हैं क्या? ऐसा लग रहा था सबको। पशु बारबार मुस्कराते और रमणीगण मिलकर हुला–हुली ध्वनि करते हुए मंगल गीत गान कर रही थी।

    यज्ञोपवीत सम्पन्न होने के बाद प्रभुपाद ने सूर्य भगवान् का दर्शन किया, प्रणाम किया और फिर एक सुन्दर सिंहासन पर बैठ गए। असंख्य रमणियों की भीड़ जुड़ गई। सर्वांग विभूषित थे उनके । फूली न समाती थी वसुधा–वर के दर्शन कर। बार-बार कह उठती एक दूसरे से बहना ! कैसा सुन्दर वर पाया है वसुधा ने। रेवती ने बलराम, पार्वती ने शंकर, लक्ष्मी ने नारायण, सीता ने
राम, ऐसा लगता है, वैसे ही वसुधा ने परम सुयोग्य वर श्रीनिताई चाँद को पाया।

    निर्दिष्ट समय पर पुरोहित जी भी अधिवास कराने के लिए आ पहुँचे।उन्होंने श्रीनिताईचाँद के हाथ में कंगन बाँध दिया। अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे। चारों ओर आनन्द ध्वनि छा गई। मंगलगीत परमानन्द बरसाने लगे।श्रीसूर्यदास भी अपने बन्धुबान्धवों सहित अपने गाँव लौट आये और वसुधा का शुभ क्षणों में मंगलमय अधिवास किया। पुरोहित जी ने वसुधा को अलंकृत करने का आदेश दिया। वसुधा-रानी का शिल्प–पण्डिता सखियों ने एकान्त में श्रृंगार करना आरम्भ किया। केशरिया रंग की जड़ताड़ी साड़ी, नीलकंचुकी, पहराकर रंगीन फल के गुच्छे दोनों कानों में पहराये, जो झूम-झूम कर स्कन्धों को सुशोभित कर रहे थे। सखियों ने ललाट पर छोटी-छोटी अलकावली सँवारी, और एक-एक केश को संवार कर सुदीर्घ बेनी गुंथी। मुख-कमल पर कुमकुम–केसर का लेप कर तिलक रचना कर दी। चञ्चल नेत्रों में कज्जल लगाकर कानों तक रेखाएँ बढ़ा दीं। मस्तक के मध्य में लाल बिन्दु और चिबुक पर कस्तूरी की श्याम बिन्दु विठाई । तिलपुष्पवत् नासिका पर तिलक रचना कर उसमें एक सोने में मढ़ा हुआ मुक्ता (बुलाक) पहिरा दिया।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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