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*श्रीनिताई चाँद*
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*विवाह लीला*
श्रीसूर्यदास भी अपने बन्धुबान्धवों सहित अपने गाँव लौट आये और वसुधा का शुभ क्षणों में मंगलमय अधिवास किया। पुरोहित जी ने वसुधा को अलंकृत करने का आदेश दिया। वसुधा-रानी का शिल्प-पण्डिता सखियों ने एकान्त में श्रृंगार करना आरम्भ किया। केशरिया रंग की जड़ताड़ी साड़ी, नीलकंचुकी, पहराकर रंगीन फूलों के गुच्छ दोनों कानों में पहराये, जो झूम-झूम कर स्कंधों को सुशोभित कर रहे थे। सखियों ने ललाट पर छोटी-छोटी अलकावली संवारी, और एक-एक केश को सँवार कर सुदीर्घ बेनी गूँथी। मुख कमल पर कुमकुम केसर का लेप कर तिलक रचना कर दी। चञ्चल नेत्रों में काजल लगाकर कानों तक रेखाएँ बढ़ा दीं। मस्तक के मध्य में लाल बिन्दु और चिबुक पर कस्तूरी की श्याम बिन्दु बिठाई । तिलपुष्पवत् नासिका पर तिलक रचना कर उसमें एक सोने में मढ़ा हुआ मुक्ता (बुलाक) पहिरा दिया। उसकी लटकन ऐसी लगती थी, मानो तिलपुष्प में से मकरन्द की बिन्दुएँ बिम्बाधर पर झर रही हैं। कण्ठ में सोने की कण्ठी, कठला, वक्षस्थल पर मुक्तामणि के हार और पदक अदभुत शोभा दे रहे थे। भुजाओं में मुक्ता के अंगद, हाथों में सोने के बलय और चूड़ियाँ, चरणों में स्वर्ण नूपुर डालकर उन्हें जावक से रंजित कर दिया था। फिर एक विशाल पुष्प–माला को चन्दन से चर्चित कर गले में डाल दिया, जिसकी दिव्य सुगन्ध पर मधुकर आ–आकर मंडरा रहे थे।
गो-धूलि का समय आ पहुँचा। इधर श्रीपुरोहित जी ने वर को सजाने का आदेश दिया। श्रीनिताईचाँद विष्णुमण्डप पर विराजमान हो गए।श्रीकृष्णदास आदि आकर लगे सजाने दूलहा को । श्रीनिताईचाँद तो सहज ही कोटि-कोटि रतिपति मनमोहनकारी हैं, उस पर फिर दूलहे की नव वेष-भूषा, स्वर्ण-मणिमय आभूषण, मुक्ताहार, चन्दन, माला, पुष्प अलंकार फूलों के गजरे, सिर पर स्वर्ण-मुकुट कोटि सूर्यों को पराजित कर चारों ओर
महा ज्योतिपुंज विस्तीर्ण कर रहा था। मूर्तिमान श्रृंगार ही सब का मन आकर्षित करने लगा।
श्रीपुरोहित जी ने बारात के प्रस्थान का आदेश दिया। फिर क्या देर थी-एक सुन्दर विशाल पालकी सजाई गई और हमारे श्रीनिताईचाँद को उस पर विराजमान कर दिया गया। बजाने लगे एक तान में अनेक बाजे शहनाई और दुन्दुभि । नर्तक, गायक नृत्य-गान करते हुए आगे बढ़े। बंदीजन-गुणीजन श्रुति स्वर में यश-कीर्ति बखान करने लगे। बारात सालिग्राम की ओर चल पड़ी। चारों ओर आनन्द मंगलध्वनि छा गई। अपने-अपने दरवाजों पर निकल कर रमणीगण खड़ी-खड़ी मंगल गीत गाने लगीं अनेक जन आनन्द विह्वल होकर अपने छोटे-छोटे बच्चों को कन्धों पर बिठा, कोई उनकी अँगुली हाथ से पकड़ बारात के साथ-साथ ही चलने लगे।
इस प्रकार भ्रमण कर बारात पण्डित जी के द्वार पर पहुँची जो अनेक फूलों के वन्दनवार, मंगल कलशों से सजाया गया था। कदली के वृक्ष चारों ओर सुशोभित थे। नवदुलहा श्रीनिताईचाँद आज पूर्णचन्द्र की तरह देदीप्यमान हो रहे थे। श्रीवसुधा छत पर चढ़ अलक्षित रूप से प्राणपति की शोभा निहारने लगी। पण्डित ने आगे बढ़कर श्रीनिताईचाँद को अपने हाथों से पकड़कर पालकी से नीचे उतारा। धूप, दीप, गन्ध, पुष्प, माला आदि देकर प्रभु का पूजन किया और विवाह-स्थल पर ले आए। रमणियों की हुलाहुलि की उच्च मंगल-ध्वनि से मण्डप गूंज उठा। प्रभु एक दीर्घ चौकी पर खड़े हो गए।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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