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*श्रीनिताई चाँद*

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*विवाह लीला*

   नवदुलह श्रीनिताईचाँद आज पूर्णचन्द्र की तरह देदीप्यमान हो रहे थे।श्रीवसुधा छत पर चढ़ अलक्षित रूप से प्राणपति की शोभा निहारने लगी।पण्डित ने आगे बढ़कर श्रीनिताईचाँद को अपने हाथों से पकड़ पालकी से नीचे उतारा। धूप, दीप, गन्ध, पुष्प, माला आदि देकर प्रभु का पूजन किया और विवाह-स्थल पर ले आए। रमणियों की हुलाहल की उच्च-ध्वनि से मण्डप गूंज उठा। प्रभु एक दीर्घ चौकी पर खड़े हो गए।ब्राह्मणों ने दीपों को हाथ में लेकर सात बार इनकी प्रदक्षिणा की। रमणीगण मुंह में वस्त्र देकर हँसती जा रही थीं और आनन्द के मारे फूली न समाकर एक-दूसरे के ऊपर गिरी जा रही थीं टक-टकी बाँधकर | नव-दूल्हा निताईचाँद के चार आत्मीयजन एक दिव्यपालकी पर सौभाग्याकांक्षिणी वसुधा रानी को वहाँ ले आये। प्रभु की प्रदक्षिणा कराई। पान, पुष्प माला समर्पण कर एक दूसरे की ओर दुलह-दुल्हिन ने देखा। गले में दिव्य पुष्पमाला समर्पणकर श्रीवसुधा जी का स्वाभाविक सहज प्रेम-समुद्र उमड पड़ा। प्रेम-मूर्छा आने लगी। सखियों ने सम्हाला । चिर दिन के बाद आज वसुधा रानी ने प्राणनाथ को पुनः प्राप्त कर असीम आनन्द अनुभव किया। परन्तु लज्जा से वह मस्तक झुका कर खड़ी ही रही। सखियाँ हाथ पकड भवन में ले गई। ब्राह्मण पुरोहितों ने यथाविधि विवाह पढ़ा। सौभाग्यवान सूर्यदास पण्डित ने भगवदरुप जमाता का वरण कर कन्या का सम्प्रदान किया। वर-कन्या को विश्राम एवं कुल-रीतिरिवाज के अनुसार भीतर अन्तःपुर में ले जाया गया। समस्त बरातियों ने अति मधुर व्यंजनों का भोजन कर जनवासे में आकर विश्राम किया।

    दूसरे दिन प्रातः श्रीनिताईचांद ने स्नानादि से निवृत्त हो कुशकण्डिका पर
बैठकर यज्ञादि कर्मों का संपादन किया और फिर आत्मीयजनों के साथ मिलकर स्वयं भोजन करने बैठे।

    श्रीवसुधा की छोटी बहन जाहवा बार-बार अनेक व्यञ्जनों को ला ला कर परिवेषण करने लगी। स्वाभाविक स्नेह जाग उठा था श्रीनित्यानन्द प्रभु के प्रति । भोजन परोसते में जाह्नवा के सिर से बार बार वस्त्र खिसकता था और वह उसे बार-बार सिर ढंकने के लिए सम्हालती जा रही थी। मन्द
मुस्कान, लजीले नेत्र, भोली-भाली चेष्टायें मनाकर्षक थी हीं । कौतुकी प्रभु ने झट जाहवा का हाथ पकड़कर खींचा और श्रीवसुधा रानी की बगल में उसे बैठा लिया और पण्डित श्रीसूर्यदास (अपने श्वसुर जी) से बोले आपने श्रीवसुधा के दहेज में क्या दिया है ? पण्डित अभी कुछ उत्तर न दे पाये कि प्रभु बोले- तुम्हारी इस छोटी कन्या जान्हवा को मैंने दहेज में स्वीकार कर लिया। पण्डित सूर्यदास ने झट मस्तक झुकाकर कहा- ''निताईचाँद । आपके
लिए मेरा क्या अदेय है ?

*जाति प्राण धन गृह परिजन मोर।।*
*एक काले समर्पण केला पाय तोर ।।।*

   मेरी जाति, प्राण, धन, सम्पत्ति, घरबार, परिवार सब आपके चरणों में समर्पित है।' इतना कहकर पण्डितजी ने जान्हवा का हाथ पकड़ कर श्रीनिताईचाँद के हाथ में दे दिया। आत्मीय बन्धुबान्धव सब जय-जयकार कर आनन्दित हो उठे। सबने एक स्वर में कहा सूर्यदास ! तुमने सचमुच श्रीकृष्ण को खरीद लिया है। तभी तो श्रीनिताईचाँद की इतनी कृपा है तुम पर।

   श्रीनिताई चाँद श्रीवसुधा, श्रीजान्हवा को सँग ले बरातियों के साथ अतिशय शोभा सहित बड़गाछि ग्राम में यथा समय लौट आये, श्रीवास की धर्म पत्नी आदि रमणियों ने सब रीति-रिवाज आनन्द पूर्वक सम्पन्न किये।

     कुछ दिन बाद बड़गाछि में निवास कर श्रीनिताईचाँद नदिया में पधारे। श्रीवसुधा, श्रीजान्हवा को देखकर शचीमाता को जो आनन्द हुआ वह अनिर्वचनीय है, सब नदियावासी भक्तगण, उनकी रमणियाँ आनन्द से विह्वल हो उठीं। कुछ दिन बाद माता शची से आज्ञा लेकर आप शान्तिपुर पधारे | वहाँ श्रीअद्वैताचार्य–माता सीता तथा समस्त भक्त प्रभु के दर्शन कर कृतार्थ हुए।।वहाँ से प्रभु भक्तों की इच्छा से खड़देह ग्राम में पधारे और प्रियाओं सहित वहाँ निवास करने लगे। खड़देह प्रदेश में संकीर्तन विलास कर वहाँ के निवासियों को कृष्ण प्रेम में प्लावित करने लगे।

    इस प्रकार अनन्त लीला-धाम गृहस्थ धर्मों का पालन करने लगे। प्रभु ने अपने भवन में श्रीश्यामसुन्दर विग्रह की सेवा स्थापना की।श्रीवसुधा-जान्हवा जी प्रीतिपूर्वक सेवा सम्पादन करने लगीं। अद्यावधि अक्रोध परमानन्द परमदयाल मूर्ति श्रीनिताईचाँद अपने नित्य-धाम में सपरिवार नाम संकीर्तन विलास द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमरस का आस्वादन करते हुए विहार करते हैं एवं अपने चरणनिष्ठ दासों को अपनी रूपमाधुरी का आस्वादन कराते हुए अतिशय करुणा विस्तार करते रहते हैं। उनकी लीलाएँ असंख्य हैं, अपार हैं। स्वयं अनन्त भी उनका अन्त नहीं पा सकते। उनकी कृपा से ही उनकी लीलाओं का यत्किञ्चित आस्वादन भाग्यवान व्यक्ति कर सकते हैं।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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