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*श्रीनिताई चाँद*
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*शंका-समाधान*
श्रीनिताईचाँद की विवाह लीला को पढ़ सुनकर अनेक तार्किक लोगों के मन में उनके विषय में कुतर्क उठ खड़े होते हैं और संन्यास के बाद विवाह और गृहस्थाश्रम में प्रवेश एक अनोखी घटना प्रतीत होने लगती है। साधारणत इस प्रकार के कुतर्क का उठना अल्पज्ञ एवं भगवत्तत्त्व अनभिज्ञ जीवों के लिए स्वाभाविक भी है। परन्तु वे लोग परमहंस-शिरोमणि श्रीशुकदेव मुनि के
वचनों को भूल जाते हैं कि-
*धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् ।*
*तेजीयसां न दोषाय वहे सर्वभुजो यथा ।।।*
(श्रीभागवत १० [३३।३०।)
ईश्वर में धर्म–मर्यादा का उल्लंघन और साहस अर्थात निर्भयता दीखने में आती है, परन्तु वे तेजस्वी अर्थात् विशेष शक्ति सम्पन्न होते हैं इसलिय उनके पक्ष में वह सब किसी दोष या प्रत्यवाय का कारण नहीं होता। जैसे अग्नि पवित्र-अपवित्र समस्त वस्तुओं का भोजन करता है (जला देता है )परन्तु कभी वह दूषित नहीं होता।
यह श्लोक यद्यपि श्रीशुकदेव मुनि ने भगवान कृष्ण की रास लीला के सम्बंध में उठी शंका के समाधान में राजा परीक्षित को कहा है तथापि इसका अभिप्राय यह है कि जो कर्मादि की परतंत्रता से रहित ब्रह्मा शिव आदि सर्वसमर्थ ईश्वर हैं विशेष शक्ति सम्पन्न तेजस्वी हैं, उनमे भी धर्म मर्यादा का उल्लंघन और निर्भयता आदि दोष के कारण नहीं हैं, जैसे मल मूत्र मृतक शरीर आदि का भोजन करने पर भी अग्नि सदा पवित्र और दोष रहित माना जाता है। तब श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं, ब्रह्मा शिवादि ईश्वरों के भी परम ईश्वर हैं इनमें दोष की गन्ध कहाँ ? जिनकी कृपा से ईश्वर असाधारण शक्ति,प्राप्त कर दोष रहित माने जाते हैं, तब उन श्रीभगवान में धर्म-मर्यादा उल्लंघन ही नहीं है, तज्जनित दोष का तो प्रश्न ही नहीं उठता।।
श्रीनिताईचाँद हैं स्वयं श्रीभगवान् श्रीकृष्ण के अभिन्न स्वरूप श्रीबलराम् ।।वे भगवत-तत्त्व ही हैं।मायाबद्ध जीव के लिए विधि-निषेध का विधान है ,श्रीभगवान् मायातीत हैं और विधि-निषेध के बिल्कुल परे हैं। अतः संन्यास के बाद विवाह की लीला का आचरण उनके लिए किसी दोष या आश्चर्य का विषय नहीं है लौकिक लीला में उन्होंने जो संन्यास ग्रहण किया था, उस संन्यास के आचरण को उल्लंघन करने का दोष उनको स्पर्श नहीं कर सकता है। विशेषतः लौकिक संन्यास लीला में भी वे थे अवधूत-संन्यासी । सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण प्रेम में विह्वल रहने के कारण उन्हें बाह्यानुसन्धान नहीं रहता था।संन्यास के आचार-विचार पालन की ओर उनका ध्यान तक भी नहीं रहताथा।संन्यासोपनिषद् में कहा गया है- "अवधूतस्त्वनियमः ।। २।१४ अवधूत का कुछ नियम नहीं रहता। श्रीनिताईचाँद तो ब्रजगोप-भाव में कृष्ण–प्रेमाविष्ट रहते थे, उन्हें बाहर की, यहाँ तक अपने शरीर के असन–वसन की भी कुछ सुध-बुध न रहती थी। ऐसी अवस्था में जब जीव को भी संन्यासाचरण के उल्लंघन का कोई दोष नहीं लगता तब स्वयम भगवत तत्व निताई चाँद के लिए कैसा दोष?
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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