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*श्रीनिताई चाँद*

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*शंका समाधान*

   श्रीकविराज कृष्णदास गोस्वामी ने श्रीनित्यानन्द-शाखा वर्णन प्रसंग में स्पष्ट लिखा है कि श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी मूल स्कन्ध थे। ईश्वर होकर भी जो 'महाभागवत कहलाए। वेद धर्मातीत होकर भी जिन्होंने वेदधर्म का पालन कर जगत् को उसकी शिक्षा प्रदान की। जिनकी अपार कृपा–महिमा समस्त विश्व आजतक महाप्रभु श्रीगौरांग तथा श्रीनिताईचाँद का गुणगान कर रहा है-

*अद्यापि याँहार कृपा-महिमा हइते ।*
*चैतन्य नित्यानन्द गाय सकल जगते ।।*

    दूसरी बात यह भी है कि जगत के मूर्ख, नीच, पतित कलिग्रस्त जीवों को प्रेम-भक्ति देकर उद्धार करने के लिए श्रीअद्वैताचार्य प्रभु ने आराधना कर स्वयं श्रीकृष्ण को श्रीगौरांग रूप से सपार्षद अवतीर्ण कराया और उन्होंनेअवतीर्ण होकर निर्विचार पूर्वक प्रेम-भक्ति का वितरण भी किया एवं भक्ति धर्म का प्रचार भी । श्रीगौर निताईचाँद के अप्रकट होने के बाद भी उनके द्वारा प्रवर्तित भक्ति-धर्म का प्रचार एवं स्थिति को बनाए रखना स्वभावतः श्रीअद्वैताचार्य प्रभु का एकान्त अभीष्ट था। उसके लिए जगत्-पालन-कर्ता क्षीरसागरशायी श्रीनारायण का अवतीर्ण होना आवश्यक था। मूल-संकर्षण श्रीनित्यानन्द प्रभु के पुत्ररूप क्षीरसागरशायी नारायण का आविर्भाव निधारण कर श्रीअद्वतप्रभु ने श्रीनिताईचाँद के विवाह की अतिशय आवश्यकता जान ली थी। इसलिए उन्होंने श्रीनिताईचाँद को विवाह के लिए सम्मत करने के लिए श्रीमन्महाप्रभु
से प्रार्थना की और उसके लिए श्रीमन्महाप्रभु के साथ एकान्त स्थान पर बैठकर श्रीनिताईचाँद को विवाह करने के लिए सम्मत कराया। उनकी स्वीकृति पाने पर वे अत्यन्त आनन्दित हुए। श्रीकविराज गोस्वामी ने लिखा है-

*चातुर्मास्य अन्ते पुन नित्यानन्द लञा ।।*
*किवा युक्ति करें नित्य निभृते वसिया।।।*
*आचार्यगोसाई के प्रभु कहे ठौरे ठौरे ।।*
*आचार्य तज्र्जा पढ़े केहो बुझिते न पारे।।।*
*तार मुख देखि हाले शचीनन्दन ।।*
*अंगीकार जानि आचार्य करेन नर्तन।।।*
*किवा प्रार्थना, किवा आज्ञा, केहो न बझिल ।।*
*आलिंगन करि प्रभु तारे विदाय दिल ।।।*

श्रीचैतन्यचरितामृत २।१६।५८-६०

    कविराज श्रीकृष्णदास गोस्वामी के इन वचनों को ध्यान देने से हम यह सहज में जान सकते हैं कि श्रीमन्महाप्रभु ने एकान्त स्थान पर श्रीनिताईचाँद से जो परामर्श किया, वह भक्ति–प्रचार सम्बन्धी तो हो नहीं सकता क्योंकि भक्ति प्रचार के सम्बन्ध में तो श्रीमन्महाप्रभु अनेक बार सबके सामने आदेश करते थे। अतः विवाह को छोड़कर ऐसा और कोई विषय नहीं दीखता।तो एकान्त में प्रभु परामर्श करते और फिर श्रीअद्वैताचार्य ने तजर्जा रूप के रूप में एक पहेली में जो बात की, वह श्रीनिताईचाँद के विवाह सम्बन्ध में ही संगत बैठती है। कारण श्रीनिताईचाँद के विवाह प्रयोजन को समझने पर भी श्रीमन्महाप्रभु के आदेश के बिना वे विवाह करेंगे और संन्यास आश्रम से गृहस्थाश्रम में प्रवेश करेंगे इसकी सम्भावना श्रीआचार्य नहीं कर सकते थे।विशेषतः श्रीमन्महाप्रभु जो स्वयं संन्यासी हैं, दूसरे संन्यासी को विवाह का उपदेश और आदेश किसी के सामने स्पष्ट रूप में नहीं देंगे यह बात भी
श्रीअवैताचार्य अच्छी प्रकार जानते थे। श्रीअद्वैताचार्य स्वयं गृहस्थी होकर भी दूसरे के सामने साधारण भाषा में श्रीनित्यानन्द के विवाह की बात संन्यासी महाप्रभु से पूछें—यह भी उन्हें संगत नहीं प्रतीत होता था। इसलिए उन्होंने तजर्जा के रूप में श्रीमन्महाप्रभु से जिज्ञासा की। किसी गोपनीय बात को कहते समय अद्वैताचार्य प्रायः तजर्जा का ही प्रयोग करते थे। अतः श्रीमन्महाप्रभु से निताईचाँद की विवाह की स्वीकृति को जानकर अद्वैताचार्य नाच उठे
क्योंकि प्रभु द्वारा प्रचारित प्रेम-भक्तेि धर्म की स्थिरता की अभिलाषा की पूर्ति उन्हें दीखने लगी थी। इन वचनों का एक मात्र अभिप्राय श्रीनिताईचाँद के विवाह सम्बन्ध में ही महानुभवी पुरुषों ने निर्णय किया है।

   भगवान जब भी अवतीर्ण होते हैं, अपने परिकरों के साथ अपनी शक्ति-समूह के साथ ही प्रकटित होते हैं। श्रीबलराम जी जब श्रीनिताईचाँद के रूप में अवतरित हुए तो उनकी नित्य कान्ताओं श्रीरेवती एवं वारुणी का अवतरित होना भी अनिवार्य था। वे श्रीवसुधा तथा श्रीजान्हवा रूप में प्रकटित हुई। नरलीला में श्रीनिताईचाँद के साथ उनका मिलन भी तो अवश्य होना
चाहिए था। महासंकर्षण श्रीनिताईचाँद से लौकिक लीला में उनके अंश कला–रुप क्षीरसागरशायी नारायण का अवतरित होना भी आवश्यक था।फिर नरलीला के अंगरूप में आविर्भूत होने के लिए जन्म-लीला का प्रकटित होना, उसके लिए श्रीनिताईचाँद की विवाह लीला के सम्पन्न होने का नितान्त प्रयोजन था इसलिए श्रीनिताईचाँद की विवाह लीला परम संगत एवं समीचीन ही है।

    विशेषतः जिन्होंने अपना सर्वस्व, अपने को पूर्णतः श्रीगौरसुन्दर हाथों में समर्पित कर दिया था, उनकी इच्छापूर्ति के लिए उनकी आज्ञा का पालन ही श्रीनिताईचाँद का स्वाभाविक-सहज धर्म था, वर्णाश्रम धर्म-नियम, लोक मर्यादा के पालन उनके लिए है जिन्होंने अपने को श्रीभगवान के हाथों में समर्पण नहीं किया है-आत्म समर्पण करने वाली व्रजांगनाओं में भी इस लोक
धर्म-पालन की गन्ध हम नहीं देखते हैं अतः श्रीनिताईचाँद की विवाह-लीला में कुतर्क करने वाले व्यक्ति भगवत्त्व से अनभिज्ञ ही हो सकते हैं। जिनका अध पतन सुनिश्चित है। अतः श्रद्धा युक्त होकर ही परम करुणामयी श्रीनिताई चाँद की लीलाओं का श्रवण मनन चिंतन ही विधेय है,जिससे उनकी कृपा प्राप्त कर जीव धन्य हो सकता है।क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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