72

*श्रीनिताई चाँद*

     7⃣2⃣

*श्रृंगार वट*

  यह प्राचीन मंदिर श्रीवृन्दावन में श्रीश्रृंगारवट के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीश्रीराधादामोदर मन्दिर की उत्तर दिशा में यमुना किनारे पर यह विद्यमान है।यमुना पर पक्का विशाल घाट बना हुआ है।यह स्थान श्रीमननित्यानन्द प्रभु की गद्दी मानी जाती है। इसमें श्रीनित्यानन्द गौराँग महाप्रभु के विशाल श्रीविग्रह प्रतिष्ठित और सेवित हैं।प्रभुपाद वीरभद्र के पौत्र श्रीरसिकानन्द जी गोस्वामी ने संवत् १६८२ में इस स्थान पर श्रीश्रीनिताई गौर के छोटे श्रीविग्रहों की स्थापना की। ग्वालियर राज घराने के दौलतसिंह सिंधिया ने स्थापत्य कलापूर्ण लाल पत्थर से मन्दिर तथा छतरियों सहित घाट का निर्माण कराया।

   श्रीरासलीला महोत्सव में भगवान् श्रीश्यामसुन्दर प्रियतमा श्रीराधा जी को सिद्ध गोपियों की निगाह बचाकर) साथ लेकर अन्तर्धान हो गये। लीला विलास के कारण राधाजी का श्रृंगार अस्तव्यस्त हो गया। श्रीश्यामसुन्दर ने पुनः श्रीराधाजी की वेणीगंथन कर उन्हें पुष्पों से जिस पावन स्थल पर श्रृंगारित किया था-यह वही दिव्य स्थल है श्रृंगारवट। यहाँ रसिक-चूडामणि अब भी प्रियतमा किशोरी जी की वेणी गूंथते हुए विराजमान हैं। प्रभुपाद श्रीरसिकानन्द जी गोस्वामी के छोटे सुपुत्र श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु बाल्यकाल से विष्यविरक्त थे। चाहते थे श्रीमन्महाप्रभु स्थापित तृणादपि सुनीच भाव का
भजन–समृद्ध आदर्श जीवन ।

   सर्वपूज्य श्रीनित्यानन्दप्रभु के वंशज होने के कारण कोई विशिष्ट गोस्वामी तथा भजनशील विद्वान वैष्णव उन्हें अपने आनुगत्य में रखकर भजन-शिक्षा देने का साहस न करता था। दूर से देखकर सब उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम करते। वे आचार्य स्थानीय थे।

    अन्ततः वे दुखी होकर बिना किसी से कहे-सुने गृहत्याग कर श्रीवृन्दावन चले आये। किसी को भी अपना स्वरूप परिचय न देकर वे श्रीपाद विश्वनाथ चक्रवती से अनेक दिन तक शास्त्र अध्ययन करते रहे। उनकी माता पुत्र-विच्छेद से दुखी हो उठी। उसने इधर-उधर अनेक वैष्णवों को उनकी खोज में भेजा।वृन्दावन में आकर एक वैष्णव ने उन्हें देखकर श्रीचक्रवर्ती पाद को उनका परिचय परिचय दिया और माता के दुःख का वृत्तान्त सुनाया। श्रीचक्रवर्ती पाद ने
शिक्षा-गुरु दक्षिणा माँगने के बहाने से उन्हें घर लौट जाने का आदेश दिया व उन्हें माता की इच्छानुसार गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का परामर्श भी दिया।वे गुरु आज्ञा पाकर घर लौटे। विवाह किया। एक पुत्र के जन्म हो जाने के बाद सब कुछ छोड़कर पुनः वृन्दावन चले आये। पूर्णिया जिला बांकुड़ा से श्रीपाद साथ ले आये श्रीश्रीनिताई–गौरांग महाप्रभु के विशाल श्रीविग्रह जो आज तक श्रृंगारवट में विधिवत् सेवित हैं। यह बात है संवत् १८१५ की।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

Comments

Popular posts from this blog

99

27

89